ब्लॉगसेतु

किसको सुनाऊँ, अज़ब दास्तां,सूना है तुम बिन, ये सारा जहां।रुँधा गला है, और आँखें हैं नम,मुस्कुराने की मैंने, ली है कसम,समय चल रहा है, हवा बह रही,ठहर सा गया हूँ, एक मैं ही माँ।सुना है तुम बिन...कसक हैं कई पर सुनाऊँ किसे,ये पाँवों के छाले दिखाऊँ किसे,बिखर जो गया, समेटे...
बेवजह से हो गए हैं ताल्लुक़ात, कुछ इन दिनों।आ तलाशें ख़ुद के भीतर, मुख़्तसर सा आदमी।।बंद कर  आँखें चला  सरपट, समय के चाल सा।अपने ही उलझन में गिरता, उठ रहा है आदमी।।खोल कर  गिरहें सभी, चुपचाप है वो आजकल।ख़ुद से ही अब  ख़ूब  बातें, कर रहा  है...
लाल, हरा, नीला, पीला, निखर रहे हैं रंग।मस्तानों की टोलियाँ,  फ़ाग में हुए मलंग।।भर पिचकारी घूम रहे,  बच्चे  चारों ओर।अनायास  बौछार  से,  राहगीर  सब दंग।।स्वप्नपरी के रूप में,  झूमें  हैं  चाचा आज।चाची गुझिया खिला रही...
बैठ कर कुछ पल मैं सोचूं, वक़्त क्यूँ रुकता नहीं...है अगर धरती से यारी,क्यूँ गगन झुकता नहीं...काश के ऐसा कभी हो,देर तक खुशियाँ मिले...ख़्वाबों की मज़बूत टहनी,में नया कोई ग़ुल खिले...ख़्वाबों की लम्बी डगर है,सिलसिला रुकता नहीं...है अगर धरती से यारी,क्यूँ गगन झुकता नह...
ख़ातिर वतन के देखो, क़ुरबां हुए हैं लाल,फड़क उठी भुजाएँ, अब ठोकने को ताल।इतना ही रहम कर दो, सुनो मेरे हुक्मरान,लाने दो काट कर सिर, रह जाये ना मलाल।सिंदूर मिट गए कई, घर-आँगन उजड़ गए,कैसी चली समय ने, ये साजिशों की चाल।ख़ामोशी छा गयी है,  सरहद  के  पार भी,दह...
ज़िन्दगी के सुहाने सफर में यहाँ,फिसलन भरे मोड़ हालात के।जल रहा है बदन, धूनी की तरह,धुएँ उठ रहे, भीगे जज़्बात के।कसक को पिरोए, वो फिरता रहा,जिया भी कभी, या कि मरता रहा।सुनेगा भी कौन, दुपहरी की व्यथा,सब तलबगार रंगीन दिन-रात के।कोई तो साथ हो, पल भर के लिए,निभा पाया कौन उ...
क्यों छूट गया हाथ से, आँचल का वो कोना।दुनिया मेरी आबाद थी, जिस के तले कभी।।एक तेरा साथ होना, था सबकुछ हमारे पास।हासिल जहां ये हमको, लगता है मतलबी।।परमपिता का जाने, ये कैसा अज़ीब न्याय।जिसको उठा ले जाये, चाहे वो जब कभी।।सहमी हुई है  धड़कन,  बदहवास  है&n...
चौड़ी छाती है वीरों की,गगनभेदी हुँकार है...नाम धनंजय, रुद्र, विनोद,करतम, माझी, करतार है...अब तो कोई जतन करे,कोई तो समाधान हो...ऐसा ना हो सुंदर बस्तर,खुशियों का शमशान हो...दारुण दुःख सहते सहते,देखो पीढ़ी गुज़र रही...बारूदों के ढेर में बैठी,साल की बगिया उजड़ रही...तन आहत...
जो भी हो जाए कम है,क्यों तेरी आँखें नम हैं?देते हैं  ज़ख्म  अपनें,मिले गैरां से मरहम है।तू अपनी राह चला चल,पीकर अपमान हलाहल।या मोड़ दिशा हवाओं के,गर तुझमें भी कुछ दम है।न्याय सिसक कर रोए,अन्याय की करनी धोए.यहाँ झूठ, फ़रेब के क़िस्से,नित लहराते परचम हैं।नैतिकत...
अज़ल से जल रहा है जो,शायद वही मशाल हूँ...जवाब हूँ मैं सवाल का,या ख़ुद ही एक सवाल हूँ...किसी को क्या बताऊँ मैं,मंज़िल भी कैसे पाऊँ मैं...नज़र भी क्या उठाऊँ मैं,ये सर भी कैसे झुकाऊँ मैं...इंकलाब हूँ ज़हीन सा,या महज एक बवाल हूँ...जल के जल रहा है जो...शायद वही मशाल हूँ...पल...