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कहानी का एक भाग आपने अभी तक पढ़ा, अब आगे..............घडी की तरफ़ देख कर डॉक्टर साहिबा ने दोनों को तीन बजे का समय दिया और हिदायत दी-"देखो, कुछ नियमों के कारण यह नहीं बताया जा सकता कि पेट में लड़का है या लड़की........." बात समाप्त होने के पहले ही पति-पत्नी के मुंह स...
 पोस्ट लेवल : कहानी साहित्य
'आस्था नर्सिंग होम', पर्ची पर लिखे नाम को सामने तीन मंजिला ईमारत पर टंगे विशालकाय बोर्ड से मिला कर रामनरेश आश्वस्त हुआ, अपनी पत्नी पार्वती की ओर उसने एक निगाह डाली और फ़िर दोनों पति-पत्नी नर्सिंग होम के भीतर पहुँच गए. बड़े से हॉल के चरों तरफ़ पड़ी कुर्सियों पर लोगों...
 पोस्ट लेवल : कहानी साहित्य
आलीशान बंगले के विशाल नक्काशीदार दरवाजे के सामने एक छोटा बालक लगातार कुछ मिलने की गुहार लगा रहा था। 'शायद आज चौकीदार छुट्टी पर था नहीं तो उसने अभी तक भगा दिया होता' ऐसा सोचते हुए बच्चे ने फ़िर जोर की आवाज़ लगाई। बरामदे में बंधे दोनोविदेशी 'डोगी' भौंक-भौंक कर उस बाल...
 पोस्ट लेवल : साहित्य लघुकथा
माँ अपने दोनों बच्चों का लगातार भूख से रोना नहीं देख सकी। एक को उठा कर अपने सूख चुके स्तन से लगा लिया, किंतु हड्डियों से चिपक चुके माँ के मांस से ममत्व की धार न बह सकी, क्षुधा शांत न हो सकी। भूख की व्याकुलता से परेशान बच्चे रोते ही रहे। भूखे बच्चों को भोजन देने में...
 पोस्ट लेवल : साहित्य लघुकथा
स्पंदन के प्रधान संपादक डॉ० ब्रजेश कुमार जी की कविता जग ने देखी वह मुक्त हंसी, मन का रोंदन किसने जाना। किसने समझा हर धड़कन में, सौ-सौ संसार पला होगा।। मुस्का कर जग ने छीना,सुख सपनों का संसार मेरा।दो टूक खिलौने के लेकर,सीखा दुल्राना प्यार तेरा।सबने देखी मुख की शोभा...
 पोस्ट लेवल : साहित्य अभिव्यक्ति
भूमन्दलीकरण के इस दौर में जब समाज में स्त्री विमर्श की चर्चा की जाती है तो स्त्री विमर्श की वास्तविकता और कल्पना के मध्य बारीक सी रेखा विश्व स्तर पर दिखाई देती है. इसी बारीक अन्तर के मध्य चार घटनाओं को स्त्री विमर्श के साथ रेखांकित किया जाना भी अनिवार्य प्रतीत होता...
माँ,मुझे एक बार तो जन्मने दो,मैं खेलना चाहती हूँतुम्हारी गोद मैं,लगना चाहती हूँतुम्हारे सीने से,सुनना चाहती हूँमैं भी लोरी प्यार भरी,मुझे एक बार जन्मने तो दो;माँ,क्या तुम नारी होकर भीऐसा कर सकती हो,एक माँ होकर भीअपनी कोख उजाड़ सकती हो?क्या मैं तुम्हारी चाह नहीं?क्य...
 पोस्ट लेवल : मेरी कविता साहित्य
चलो फ़िर हलचल मची है शहर मेकोई कुछ सुना गया है शहर मेये आवाज़ कुछ अलग सी हैदिल मे एक दर्द जगाती सी हैइसके साये मे कुछ छिपा सा हैइसमे एक महक भरी सी हैक्यों इसके साथ कोई झूमता नहीं हैक्यों कोई इस आवाज़ पर थिरकता नहीं हैदेखो ध्यान से, सुनो गौर से,इस आवाज़ मे धमक सी हैक...
 पोस्ट लेवल : मेरी कविता साहित्य