ब्लॉगसेतु

मोबाइल के तेज अलार्म को खामोश करके हम आराम से चादर तानकर लेटे रहे। कुछ देर बाद दरवाजे पर आहट हुई। लगा कि दोस्त घूम-टहल कर वापस आ गया है, सो लेटे-लेटे ही सवाल दागा। उधर से कोई जवाब नहीं मिला मगर पलंग पर किसी के बैठने का एहसास हुआ। चादर के कोने से उस तरफ मुँह घुमाते...
 पोस्ट लेवल : कहानी
आज खोज रहे थे कोई और काग़ज़ मिल गये मगर गुम हुएकई पुराने काग़ज़, ख़त निकला इक तेरा और संग निकला इक ख़त मेरा भी, प्रेषित पत्र की छाया में लिपटा एक अप्रेषित ख़त, जो लिखा तो गया शिद्दत से पर तुमने पढ़ा न कभी दिल से. जाने कितनी बार सुबह से, पढ़ डाले वो सभी प्रेषित-अप्र...
 पोस्ट लेवल : कविता
वो दर्द सीने में आज भी है जिन्दा.हाँ, लड़की हूँ मैं तुम्हें इससे क्या,हैं मेरे भी कुछ सपने तुम्हें इससे क्या, तुम्हारे लिए तो महज एक देह थी, शारीरिक सौन्दर्य की मूर्ति भर थी,तुम्हारी चाह मैं नहीं मेरा शरीर था, वो दर्द सीने में आज भी है जिन्दा.तुम्हारे इजहार पर मेरा...
 पोस्ट लेवल : कविता गीत
मदर्स डे पर दिन भर दिखती रही माँ, सबकी कविता, फोटो में सजती रही माँ,  एक पल का जश्न और फिर ख़ामोशी,अपने कमरे में अकेले सिसकती रही माँ.तुम हँसते हो तो खिल उठती है माँ, बोल सुन तुम्हारे चहक उठती है माँ, इतनी मोहब्बत है उससे गर तो क्यों,सबके बीच भी अकेली दिखत...
 पोस्ट लेवल : कविता
बुन्देलखण्ड का प्रवेश द्वार, है शान हमारी कालपी.है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी. माँ वनखंडी औ वेद व्यास का सम्मान हमारी कालपी.है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी. भव्य भास्कर जिस धरती पर, सबसे पहले आते हों,पावन यमुना के आँचल में, खेत जहाँ लहलहाते...
 पोस्ट लेवल : कविता
शिक्षित व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. इधर कुछ समय से लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर साक्षरता जैसे देह के आसपास सिमटती जा रही है. इस देह में भी उस विमर्श के लिए स्त्री-देह सबसे सहज विषय-वस्तु...
 पोस्ट लेवल : स्त्री विमर्श आलेख
तेरे खुशबू में भरे ख़त मैं जलाता कैसे,प्यार में भीगे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,तेरे उन खतों को गंगा में बहा सकता नहीं,आग बहते हुए पानी में लगा सकता नहीं,वो ख़त आज भी मेरे दिल की दौलत हैं,तूने जो छोड़ी है मेरे पास वो अमानत है.जब कभी भी खुद को तन्हा पाता हूँ,खतों के साथ तेर...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल साहित्य
कितना समझाया है मन मतवाले,न सपने तू देखा कर-सपनों की दुनिया में महज छलावे,न सपने तू देखा कर-सपनों की दुनिया निर्मोही,खो जायेगा ओ मनमौजी,सुख है केवल दो पल का,वह भी केवल कोरा-कोरा,मृगतृष्णा सी एक जगाकर,आ जाते हैं हमें डराने,कितना समझाया है मन मतवाले,न सपने तू देखा कर...
 पोस्ट लेवल : कविता साहित्य
तपती दुपहरी की शाम देखी है कभी?दिल जब कभी तन्हा सा लगेसाथ होकर कोई साथ न दिखेऐसे में कोई लगा कर अपने गले रोम-रोम में अपनापन भर देतब दिखाई देती हैतपती दुपहरी की शाम।तपती दुपहरी की शाम महसूस की है कभी?धूप दुखों की फैली हो सिर परसुख की छाँव कहीं आये न न...
 पोस्ट लेवल : कविता
जिंदगी को कभी तो ज़िन्दगी बनाओ,रोना बहुत हुआ अब तो मुस्कुराओ. चाँद को रोटी बता बहुत बहलाया, भूखे को अब असली रोटी दिखाओ. बेबसी से उसका जन्म से नाता है, एक बार उसे ख़ुशी से मिलवाओ. ज़िन्दगी लाख बेवफ़ा हो बनी रहे, इस बेवफ़ा से परिचय तो करवाओ. मौत के साथ जो रोज खेलता है,उसक...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल साहित्य