ब्लॉगसेतु

उस दिन रविवार था, अगस्त का पहला रविवार. उन दिनों मोबाइल सपने में भी सोचा नहीं गया था. बेसिक फोन की घंटी घनघनाई. रविवार होने के कारण सभी लोग घर में ही थे. कोई विशेष दिन मनाये जाने का न चलन था और अपनी आदत के अनुसार हम भी ऐसे किसी दिन के प्रति सजग-सचेत नहीं थे. सचेत-स...
उस दिन रविवार था, अगस्त का पहला रविवार. उन दिनों मोबाइल सपने में भी सोचा नहीं गया था. बेसिक फोन की घंटी घनघनाई. रविवार होने के कारण सभी लोग घर में ही थे. कोई विशेष दिन मनाये जाने का न चलन था और अपनी आदत के अनुसार हम भी ऐसे किसी दिन के प्रति सजग-सचेत नहीं थे. सचेत-स...
लोग एक-एक करके मंच पर आते, माइक पर खखारते और फिर लम्बी-लम्बी फेंकना शुरू करते. व्यक्ति-विशेष की तारीफ में हॉल के भीतर ही पुल बनाये जाने लगते हैं. माइक पर शब्दों की लफ्फाजी करता व्यक्ति, बातों के बताशे फोड़ता हुआ तारीफों के बांधे जाते पुल के सहारे धीरे से कम्पनी प्रब...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
२ - रहस्य जीवन का+++++++++++ जीवन रूपी रहस्य कोमत खोज मानव,डूब जायेगाइसकी गहराई में।तुम से न जाने कितनेडूब गये इसमें परन पा सके तलजीवन रूपी सागर का।छिपा है मात्र इसमें ढ़ेरलाचारी का,अंबार बेबसी का।नदी है कहीं आँसुओं की,तो कहीं आग है नफरत की।चारों ओर बस लाचारी ह...
१- मेरा भारत महान! ++++++++++++++++++++सालों पहले देखासपना एकभारत महान का।आलम था बसइन्सानियत, मानवता का,सपने के बाहरमंजर कुछ अलग था,बिखरा पड़ा था...टूटा पड़ा था...सपना...भारत महान का।चल रही थी आँधी एकआतंक भरी,हर नदी दिखती थीखून से भीगी-भरी,न था पीने को पानीहर तर...
ओ भारतमाता के प्रहरी, है तुमको बारम्बार नमन. अडिग हिमालय है तुमसे, तुमसे सागर में गहराई. धरती की व्यापकता तुमसे,तुमसे अम्बर की ऊँचाई. ओ भारतमाता के प्रहरी, है तुमको बारम्बार नमन. तुमसे मुस्काता है बचपन,तुमसे इठलाती है तरुणाई. शौर्य तुम्हारा नस-नस में, भर ले ज़र्रा-ज़...
 पोस्ट लेवल : कविता गीत
मारना और बचाना अन्योनाश्रित क्रियाएँ हैं. यदि किसी को बचाना है तो उसको मारना जरूरी है. बिना मारे बचाने जैसा कदम उठाया भी नहीं जा सकता है. ये क्रियाएँ विनाश और विकास की तरह हैं. विध्वंस और निर्माण के समतुल्य हैं. दो अलग-अलग प्रकृति की क्रियाओं का एकदूसरे से सम्बद्ध...
 पोस्ट लेवल : व्यंग्य छीछालेदर रस
आखिर ठुल्ला कहने पर इतना बवेला क्यों? किसी भी बात के कई पहलू हो सकते हैं. कुछ ऐसा ही इस शब्द में भी है, बस गौर करने की जरूरत है. ठुल्ला या कहें ठलुआ, बात घूम-फिर कर एक ही अर्थ देती है. अब इसकी आवश्यकता अगले व्यक्ति को क्यों आन पड़ी ये भी समझना होगा. अगले व्यक्ति ने...
 पोस्ट लेवल : व्यंग्य छीछालेदर रस
जूता एक बार फिर उछला. जूते का निशाना एक बार फिर चूका. सवाल उठता है कि जूता अपने निशाने से क्यों भटक जाता है? सवाल ये भी कि या फिर जूते को लक्ष्य तक पहुँचाने वाले का मकसद सिर्फ जूता उछालना होता है? अब जूता उछला है तो लक्ष्य तक पहुँचना भी चाहिए. पहुँचता भी है मगर नि...
 पोस्ट लेवल : व्यंग्य छीछालेदर रस
‘माया महाठगिनी हम जानी’ के अमरघोष के बाद भी माया लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र सदैव बनी रही. इस मायामोह के चक्कर में लोग ज्यादा न फँसें, ज्यादा न बहकें इसके लिए समाज के ज्ञानी-ध्यानी बुजुर्गों ने ब्याज को हराम बताते हुए लोगों को इससे दूर रहने की सलाह दी. समाज ने इस...
 पोस्ट लेवल : व्यंग्य छीछालेदर रस