ब्लॉगसेतु

देखते होंगे खुद को आइने में और शरमाते भी होंगे, सजाते होंगे मन में हमारे सपने और लजाते भी होंगे। . एक एक लम्हा मिलन का वो सजोये हैं दिल में अपने, गुदगुदाते भी होंगे जो उन्हें और कभी रुलाते भी होंगे। . ख्वाब में मिलने की कोशिश और नींद आंखों में नहीं, य...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
अपनों के बीच हो गये हैं कुछ यूं बेगाने से, हमारे साये ही अब हमारे साथ नहीं चलते। . हमें रुला सकें नहीं थी ताकत इतनी गमों में, वो खुशी ही इतनी मिली कि आंसू छलक उठे।. था पता होगा बहुत ही मुश्किल जिसको पाना, दिल के अरमान उसी की खातिर मचल गये। . खो ग...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
चारों ओर इंसान के ज़िन्दगी का अजब घेरा है, चाह है जिये जाने की पर मौत का बसेरा है। . लगा था जो ज़िन्दगी आसान बनाने में, अब उसी को पल-पल मौत मांगते देखा है। . ज़िन्दगी उसको आज करीब से छूकर निकली, मौत के साथ खेलना तो उसका पेशा है। . क्या पता था राह मंजि...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
आज शाम को हमारे मोहल्ले के एक छोटे से बच्चे ने हमें परेशान कर डाला। दरअसल जबसे बिग-बी ने रंगीन सेल्युलाइड की दुनिया के छोटे पर्दे पर आकर लोगों को करोड़पति बनाने का कार्यक्रम शुरू किया है तबसे हमें भी बिना मेहनत के करोड़पति बनने का भूत सवार हो गया है। इसी...
 पोस्ट लेवल : साहित्य व्यंग्य
तथाकथित भगवानों की नाकामी पर अपने आँसुओं को कुर्बान करने वाले देशभक्त भारतीय नौजवान और नवयुवतियो....इन के साथ इनके भगवानों को महिमामंडित करने वाली मीडिया के जागरूक पहरुओ...क्यों निराश हो रहे हो क्षणिक नाकामी पर? इन वीर योद्धाओं के द्वारा तो सदा से यही ह...
 पोस्ट लेवल : साहित्य व्यंग्य
बेटी है अपनी, अपने गले लगा के चलो। लग रही गुमसुम सी, उसे हँसा के चलो।।दिल है अपना अपनी ही धड़कन, साँस अपनी और अपना तन-मन। रूप-स्वरूप उसका जब है अपना सा, तो फिर क्यों उसको गैर बना के चलो।। बेटियाँ बेटों से किस तरह है कम, धरती से आकाश तक पहुंचे हैं कदम...
 पोस्ट लेवल : साहित्य कविता
हम नित हर पलखुले बाजार की ओरजा रहे हैं।तभी तो खुलेआमअपनी सभ्यता मेंखुलापन ला रहे हैं।पहले एक चैनल से काम चलाते थे,अब चैनलों की बाढ़ ला रहे हैं।लगातार देखतेढँकी-मुँदी अपनी सभ्यता को,हम बोर हो गये थे,इसी कारण सेपश्चिमी सभ्यता द्वाराअपनी संस्कृति कोनिर्वस्त्र किये जा...
 पोस्ट लेवल : साहित्य कविता
महाराज कुछ चिन्ता की मुद्रा में बैठे थे। सिर हाथ के हवाले था और हाथ कोहनी के सहारे पैर पर टिका था। दूसरे हाथ से सिर को रह-रह कर सहलाने का उपक्रम भी किया जा रहा था। तभी महाराज के एकान्त और चिन्तनीय अवस्था में ऋषि कुमार ने अपनी पसंदीदा ‘नारायण, नारायण’...
 पोस्ट लेवल : साहित्य व्यंग्य
सुबह-सुबह आँख खुली तो कमरे का नजारा बदला हुआ लगा। जहाँ सोया था जगह वो नहीं लगी, पलंग भी वो नहीं था, आसपास का वातावरण भी वो नहीं था। चौंक कर एकदम उठे और जोर की आवाज लगाई। एक हसीन सी कन्या ने प्रवेश किया, समझ नहीं आया कि घर में इतनी सुन्दर कन्या कहाँ से...
 पोस्ट लेवल : साहित्य व्यंग्य
रास्ते पर भागमभाग मची हुई थी। सभी लोग एक प्रकार की हड़बड़ी सी दिखाते हुए एक ही दिशा में भागे चले जा रहे थे। यह समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया है कि बाजार में इस तरह की अफरातफरी का माहौल बना हुआ है। दो-एक को रोक कर पूछने की कोशिश की पर कोई न...
 पोस्ट लेवल : साहित्य लघुकथा