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बहशी दरिंदों ने उसकी देह के तार-तार कर दिए थे। आत्मग्लानि से  काँपता शरीर निष्पंद हुआ जा रहा था। साँसे सिसकियों में उसके प्राणतत्व को समेटे निकल रही थी। रोम-रोम खसोट लिया था उन जानवरों ने। कपड़े चिथड़े-चिथड़े हो गए थे। माटी खून से सन गयी थी।एक दरिंदे ने पेट्रोल छ...
किसी सत्ता का अहसास होना ही उसके आस्तित्व  का 'होना' है भले ही, भौतिक अवस्था में वह दृष्टिगोचर हो या न हो। कई सत्ताएँ तो भौतिक रूप में उपस्थित होकर भी अपनी उपस्थिति के अहसास का स्पर्श नहीं करा पाती और अनुभूति के धरातल पर वह आस्तित्व विहीन अर्थात 'न होना' होकर...
भारत माँ के उस महान सपूत का शव रखा हुआ था ।   सबकुछ खपाकर उसने  बची अब अपनी अंतिम साँस भी छोड़ दी थी ।   कुछ दिन पहले ही वह साबरमती से लौटे थे ।   गाँधी से पूछा था, 'महात्माजी, अब कबले मिली आज़ादी? महात्मा जी निरुत्तर थे ।  &nb...
सींच रैयत जब धरा रक्त सेबीज नील का बोता था।तिनकठिया के ताल तिकड़म मेंतार-तार तन धोता था।आब-आबरू और इज़्ज़त की,पाई-पाई चूक जाती थी।ज़िल्लत भी ज़ालिम के ज़ुल्मों ,शर्मशार झुक जाती थी।बैठ बेगारी, बपही पुतही,आबवाब गड़ जाता था।चम्पारण के गंडक का,पानी नीला पड़ जाता था।तब बाँध कफ़...
मां!कैसी समंदर हो तुम!तुम्हारी कोख के ही केकड़ेनोच-नोच खा रहे हैतुम्हारी ही मछलियां।काट डालो नकोख में हीइनके सिऊंठे!जनने से पहलेइनको।या फिर मत बनोमां!
सिंधु की धारा में धुलता'गरकौन' के गांव में।था पलता एक नया याकउस चरवाहे की ठाँव में।पलता ख्वाबों में अहर्निश, उस चौपाये का ख्याल था।सर्व समर्पित करने वाला,वह 'ताशी नामोग्याल' था।सुबह का निकला नित्य याक,संध्या घर वापस आ जाता।बुद्ध-शिष्य 'ताशी' तब उस पर,करुणा बन...
पिछले दिनों विक्रम सक्सेना का बाल उपन्यास 'चाचा की जुबानी : परदादी माँ से सुनी एक कहानी' अमेज़न पर लोकार्पित हुआ। 137 पृष्ठों के इस उपन्यास को पढ़ने में लगभग सवा तीन घंटे लगते हैं। इस पुस्तक का आमुख मेरे द्वारा लिखा गया। आमु...
अम्बर के आनन में जब-जब,सूरज जल-तल से मिलता है।कण-कण वसुधा के आंगन में,सृजन सुमन शाश्वत खिलता है।जब सागर को छोड़ यह सूरज,धरती के ' सर चढ़ जाता है!'ढार-ढार  कर धाह धरा पर,तापमान फिर बढ़ जाता है।त्राहि- त्राहि के तुमुल रोर से,दिग-दिगंत भी गहराता है।तब सगर-सुत शोधित...
मेरे कण-कण को सींचते,सरस् सुधा रस से।श्रृंगार और अभिसार के,मेरे वे तीन प्रेम-पथिक।एक वह था जो तर्कों से परे,निहारता मुझे अपलक।छुप-छुपकर, अपने को भी छुपाये,मेरे अंतस में, अपने चक्षु गड़ाए।मैं भी धर देती 'आत्म' को अपने,छाँह में शीतल उसकी, मूंदे आंखें।'मन' मीत  बन...