ब्लॉगसेतु

उपासना सियाग की नयी दुनिया गहन विचारों का कुंड है, ब्लॉग रत्न की खोज में हम उनके ब्लॉग को देखते हैं और उनकी उस रचना को, जिस पर उनका संतुलन-विश्वास गंभीर रूप से है। छोटी लकीर-बड़ी लकीर - नयी दुनिया+      दिसम्बर  के छोटे-छोटे दिन।...
"भावों को वाणी मिलने से अक्षरों की संधि एवं मन मंथन उपरांत शब्द सृजन से निकसा सुधारस मेरी कविता है।" लिखने का शौक तो बचपन से था, ब्लॉग ने मेरी भावनाओं को आप तक पहुचाने की राह आसान कर दी. काफी भावुक और संवेदनशील हूँ. कभी अपने भीतर तो कभी अपने आस-पास जो घटित होते देख...
ऑरकुट के पन्ने से ब्लॉग की दुनिया में 2008 में मुकेश कुमार सिन्हा ने प्रवेश लिया था।  छोटी छोटी बातों में उलझा उसका मन शब्दों के अरण्य में भटक रहा था, और अंततः उसे रास्ते मिले।  वह अनकहे को लिखने लगा, और आज उसकी वह पहचान है, जिसके लिए वह न कभी घबराया...
हाइकु,कविता,कहानी,लघुकथा - हर विधा में ऋता शेखर ने अपनी एक जबरदस्त पहचान बनाई है, मौसम,उत्तरदायित्व,सपने,हकीकत उनकी लेखनी में एक उम्र जीते हैं, हौसला परछाईं बन चलता है।  इस गरिमामई ब्लॉगर से भी आपसब परिचित होंगे ही, आज इस प्रतियोगिता मंच पर वे उपस्थित हैं, पढ़ि...
कुछ लम्हे दिल के...अर्चना तिवारी का धड़कता ब्लॉग ! कभी मन अनमना लगे, शाम खाली खाली हो, दिल के इन लम्हों से रिश्ता जोड़ लीजियेगा, यकीनन सुकून मिलेगा। प्रतियोगिता के इस शानदार इक्कीसवें दिन को अर्थ दिया जाए, कुछ लम्हे दिल के साथ वक़्त गुजारा जाए।  -जनतंत्र - क...
सुषमा वर्मा - सपनों की एक सुराही है।  रोज सुबह सपनों की घूंट लेती है और आहुति' लिखती हैं।  प्रेम में सराबोर व्यक्ति इस दुनिया से अलग होता है और मुझे यह ख्वाबोंवाली  ब्लॉगर ऐसी ही लगती है, खुद देख लीजिये उसकी आहुति -'आहुति': तुम तो हार तभी गये थे...!!...
 खुश रह कर दूसरों को भी सदा खुश रखने का कुछ असंभव सा कार्य करते हुए खुशी पाने की भरसक कोशिश करता रहता हूं। आस-पास कोई गमगीन ना रहे यही कामना रहती है। श्री गगन शर्मा का यह परिचय उनकी कलम, उनकी सोच को गंभीर पहचान देती है।  प्रतियोगिता के दरम्यान मुझे इ...
जीते तो सब हैं, लेकिन कुछ लोग बखिया उधड़े,रिसते एहसासों के सहयात्री बन जाते हैं। इनकी  कलम अपने वजूद पर इतराती है, धूप,सूखा,आँधी - तूफ़ान, चुप चेहरों से सुलगते,छलकते,सुबकते,ठिठकते,मुस्कुराते शब्दों की एक रेखा खींचती हैं।  इन अर्थवान रेखाओं का मर्म हैं गिरिज...
वंदना गुप्ता, नाम ही काफ़ी है यह बताने के लिए कि कलम जब आग उगलती है तो वंदना उसे रगों में भर लेती हैं या फिर उसकी रगों में प्रवाहित होती हैं।  इस बेबाक आग से आपसब परिचित होंगे ही, तो इनके आग्नेय शब्दों से मिलते हैं -ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र: शतरंज के खे...
ज़िन्दगी का सार सिर्फ इतनाकुछ खट्टी कुछ कडवी सीयादों का जहन में डोलनाऔर फिर उन्ही यादों सेहर सांस की गिरह में उलझ करवजह सिर्फ जीने की ढूँढना !!"जीने की वजह ढूंढती, बनाती रंजू भाटिया को कौन नहीं जानता।  मेरे ब्लॉग के आरम्भिक दिनों का आकर्षण रही हैं रंजू भाटिया।&...