ब्लॉगसेतु

                           छैनी-हथौड़े से ठोक-पीटकर कविता कभी बनते हुए देखी है तुमने? कुम्हार के गीले हाथों से पिसलते-मसलतेमाटी को कभी कविताबनते देखा है तुमने?शायद नहींकव...
चित्र गूगलसाभार सेनिजता मेरी हर लेनाअपने शब्दों के कूंचे सेरंग भर देनाबंद अधरों की मुख मौन भाषाबंद नयनों से पढ लेनापर निजता मेरी हर लेनामाना बिखरे पड़े हैंइश्क़ की किरचेंदर-ओ-दीवार परहो सके तो संभाल कर सहेज  लेनाआंगन की गीली मिटटी सा है मन मेरा,हो सके तो अंजुल...
"वाह...!  क्या जादू है तुम्हारे हाथों में,तुम्हारे हाथों से बनी चाय पीकर तो लगता है कि जन्नत के दर्शन हो गये।  सच कहता हूँ सुधा, शादी की पहली सुबह और आज 50 साल बीत जाने के बाद भी तुम्हारे हाथों की बनी चाय में कोई फ़र्क़ नहीं आया।" श्याम जी कहते-कह...
                                      मनुष्यों का एक झुंडभेडों को चरा रहा था  भेड़ें मूक-बघिरसिर्फ़ सांस ले रहीं थीं      नासिका-छिद्र सेकुछ ने कह...
                                             मेरी खूबसूरत सुबह बन जाओ                    मेरी हाथों...
झमेले ज़िन्दगी के तमाम बढ़ गये           मार खा...
तापस       मेरी डायरीयों के पन्नों में,       रिक्तत्ता शेष नहीं अब,       हर शुं तेरी बातों का         सहरा है..!   &...
नंदू नंदू दरवाजे की ओट से,निस्तब्ध मां को देख &#2...
पूरी पृथ्वी में मानव जाति ही जीवित जीवों में &#23...
रात्रि का दूसरा पहरकुछ पेड़ ऊँघ रहे थेकुछ मेरी तरह शहर का शोर सुन रहे थेकि पदचापों की आती लय ताल नेकानों में मेरेपंछियों का क्रंदन उड़ेल दियातभी देखा अँधेरों मेंचमकते दाँतों के बीचराक्षसी हँसी से लबरेज़ दानवों कोजो कर रहे थे प्रहार हम परकाट रहे थे हमारे हाथों कोप...