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नील गगन पर बैठ कब तक चाँद सितारों से झाँकोगे पर्वत की ऊँची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में कब तक आराम करोगे मेरा छप्पर टपक रहा है बनकर सूरज इसे सुखाओ खाली है आटे का कनस्तर बनकर गेहूँ इसमें आओ माँ का चश्मा टूट गया है बनकर शीशा इसे...
 पोस्ट लेवल : 12/10 08/02 निदा फ़ाज़ली
दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी सअई फ़रमायेंगे क्या / ग़ालिब दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई[1] फ़रमायेंगे क्याज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्याबे-नियाज़ी[2] हद से गुज़री, बन्दा-परवर[3] कब तलक हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमायेंगे, 'क्या?'हज़रत-ए-नासेह[4] गर आएं,...
 पोस्ट लेवल : जयंती मिर्ज़ा गालिब
नील गगन पर बैठ कब तक चाँद सितारों से झाँकोगे पर्वत की ऊँची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में कब तक आराम करोगे मेरा छप्पर टपक रहा है बनकर सूरज इसे सुखाओ खाली है आटे का कनस्तर बनकर गेहूँ इसमें आओ माँ का चश्मा टूट गया है बनकर शीशा इसे ब...
 पोस्ट लेवल : 12/10 निदा फ़ाज़ली
  आज मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” की १४८ वीं पुण्यतिथि है | इस मौके पर पेश है उनकी एक ग़ज़ल जो मुझे बेहद पसंद है |दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी सअई फ़रमायेंगे क्या / ग़ालिब दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई[1] फ़रमायेंगे क्याज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन...
 पोस्ट लेवल : 27/12 15/02 मिर्ज़ा गालिब
"यकुम जनवरी है, नया साल है, दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है !?" - अमीर क़ज़लबाश यकुम = first/पहला
 पोस्ट लेवल : अमीर क़ज़लबाश नया साल
आज से ठीक १९ साल पहले मैं कल्कत्ते से मैनपुरी आया था ... तब से यही हूँ ... पैदाइश के बाद के २० साल कलकत्ता मे गुजारने के बाद मैनपुरी आना और यहाँ आ कर दोबारा ज़िंदगी को एक नए सिरे से शुरू करना सहज न था ... आज भी नहीं हैं | जावेद अख़्तर साहब की यह नज़्म जब मैंने पढ़ी...
"ताबीज़ जैसा था वो शख्स;गले लगते ही सुकूँ मिलता &#...
 पोस्ट लेवल : अज्ञात शे'र
 माँ  बेसन की सौधी रोटी परखट्टी चटनी - जैसी माँयाद आती है चौका - बासनचिमटा , फुकनी - जैसी माँ ||बान की खुर्री खाट के ऊपरहर आहट पर कान धरेआधी सोयी आधी जागीथकी दोपहरी - जैसी माँ ||चिडियों की चहकार में गूँजेराधा - मोहन , अली - अलीमुर्गे की आवाज़ से खुलतीघर क...
नील गगन पर बैठ कब तक चाँद सितारों से झाँकोगे पर्वत की ऊँची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में कब तक आराम करोगे मेरा छप्पर टपक रहा है बनकर सूरज इसे सुखाओ खाली है आटे का कनस्तर बनकर गेहूँ इसमें आओ माँ का चश्मा टूट गया है बनकर शीशा इसे बन...
 पोस्ट लेवल : 12/10 निदा फ़ाज़ली
"तर्के-मय को ऐ वाइज़ तू न कुछ समझ लेना;इतनी पी चु...