ब्लॉगसेतु

यह रचना सरकार के विरुद्ध नही है पर अन्नदाता से गद्दारी नही कर सकते....आज स्ट्रॉबेरी उगाओये नई तकनीक आईआय दुगनी हो सकेगीबात सेवक ने बताईदो गुनी क्या चीज है फिरदस गुनी का ज्ञान भी हैरोपनी है कृषि अफीमी सौ गुनी का ध्यान भी हैजिद्द पर सरकार बैठीहो सके यूँ सब भलाईआ...
बन अराजक तत्व घेरेये कृषक दिल्ली हमारीकष्ट उल्का पिंड बरसादोष में सरकार सारीआज आतंकी दिखे क्योंशांति के जो हैं उपासकफिर स्वयं झंडा लगाकरचाहता क्या आज शासकरात दिन षड्यंत्र रचतीआज की सरकार न्यारीरोग कोरोना रुलायेअश्रु से सूखा नही थातब किसानी धौर्य चमकादेश जो भूखा नही...
 पोस्ट लेवल : श्रेष्ठ ये सरकार
 दो ही गज की हो दूरीरक्षा करनी है पूरीसावधानी रखनी है मास्क भी लगाइये।कोरोना का रोना भारीखतरों की है बीमारीसबको ही बचना है रोग से बचाइये।घर में ही वास करेंइच्छाओं को दास करेंजन जागृति जरूरीभय को भगाइयेपरीक्षा की है ये बेलाचीन ने खेला है खेलाएकता का म...
नवगीत भगवानीतू ठाकुर 'विदुषी'मापनी 16/14 धरणी पर हरियाली महकीराज करेगा अब भगवाइतिहास लिखे स्वर्णिम अक्षरआगाज करेगा अब भगवा।।1अब राम नाम के अनुयायी हुँकार भरेंगे भारत मेंरजत महल ये स्वर्ण जड़ित सानिर्माण करेंगे भारत मेंये मौन साधना त्याग चुकाआवाज करेगा...
अजनबी सा लग रहा घर आज कलगिन रहा पलछिन यहाँ पर आज कल।।बैठ कर आँसू बहाते हम जहाँअब नही दिखता कहीं दर आज कलशुष्क आँखे हो चुकी हैं बेजुबांदिल का कोना हो रहा तर आज कललग रही खामोश रूठी हर गली*दिल नहीं लगता है अक्सर आज कल* *चाह अब पाने की कुछ बाकी कहाँहम झुकाये चल रहे सर...
शून्य से शतक तक (एक संस्मरण)गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आदरणीय गुरदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा "कुण्डलीयाँ शतकवीर कलम की सुगंध सम्मान 2020" पाना मेरे लिए किसी स्वप्नपुर्ति से कम नही। लगभग एक वर्ष पूर्व जब "ये दोहे गूँजते से " साझा संग्रह के निमित्त मेरा गुर...
नवगीतजानें कितनी बली गईनीतू ठाकुर 'विदुषी' मापनीस्थाई पूरक पंक्ति ~~ 16/14 अन्तरा ~~ 16/16कहर प्रकृति का फिर जब टूटाजानें कितनी बली गईलगे विधाता फिर भी रूठाखुशियाँ जग से चली गई।।बंजर धरती किसे पुकारेसूखी खेतों की हरियालीभ्रमर हो गए सन्यासी सबआज कली को तरस...
नवगीतआलिंगननीतू ठाकुर 'विदुषी'मापनी~ 16/14कुंचित काली अलकें महकीमधुर पर्शमय अभिनंदनचंद्र प्रभा सी तरुणाई परमहका तन जैसे चंदन।।कजरारी अँखियों के सपनेनिद्रा से जैसे जागेदर्पण में श्रृंगार निहारेचित्त पिया पर ही लागेपिया मिलन की आस हँसी जबसोच आगमन आलिंगन।।दो तन एक प्र...
नवगीतआँसूनीतू ठाकुर 'विदुषी'मापनी 16/16घाव हँसे खुशियों के आँसूं एक और की चाहत कहकर।।प्रीत हृदय में मौन खड़ी थीभाव पड़े अंतस के ढह कर1विरह गीत लिख रही लेखनीआज डूब कर स्याही मेंछोड़ सिसकता भूल गया जोनेह खोजती राही मेंबंद द्वार पाषाणी हिय मेंमुक्त हुए कुछ दिन ही रह...
नवगीतरेल जैसी जिंदगीनीतू ठाकुर 'विदुषी'मापनी 14/14और अन्तस् मौन चीखेधड़धड़ाहट शोर आगेरेल जैसी ज़िंदगी येपटरियों के संग भागे1कल्पनाओं से भरा हैमिथ्य यह संसार देखाबंधनों में बांधती हैजीवितों को भाग्य रेखाव्याधियाँ हँसने लगी हैंसो रहे दिन रात जागे।उलझनें सुलझा रहा मनसाँस...