ब्लॉगसेतु

शूटिंग का दृश्य-गाना बजता है-‘तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई......लड़की लहराती हुई ज़ुल्फ़ों के साथ प्रवेश करती है-डायरेक्टर-‘कट! कोई दूसरा गाना लगाओ-दूसरा गाना बजाया जाता है-‘उड़ी जो तेरी ज़ुल्फ़ें......लड़की दोबारा अभिनय करती है।डायरेक्टर-‘उंह, मज़ा नहीं आ रहा.....’तीसरा गाना लगा...
ग़ज़लकोई पत्ता हरा-सा ढूंढ लियातेरे घर का पता-सा ढूंढ लियाजब भी रफ़्तार में ख़ुद को खोयाथोड़ा रुकके, ज़रा-सा ढूंढ लियाउसमें दिन-रात उड़ता रहता हूंजो ख़्याल आसमां-सा ढूंढ लियाशहर में आके हमको ऐसा लगादश्त का रास्ता-सा ढूंढ लियातेरी आंखों में ख़ुदको खोया मगरशख़्स इक लापता-सा...
ग़ज़लबाहर से ठहरा दिखता हूँ भीतर हरदम चलता हूँइक रोशन लम्हे की खातिर सदियों-सदियों जलता हूँआवाज़ों में ढूँढोगे तो मुझको कभी न पाओगेसन्नाटे को सुन पाओ तो मैं हर घर में मिलता हूँदौरे-नफरत के साए में प्यार करें वो लोग भी हैंजिनके बीच में जाकर लगता मैं आकाश से उतरा हूँ...
ग़ज़लमेरी आवारग़ी को समझेंगे-लोग जब ज़िंदग़ी को समझेंगेगिरनेवालों पे मत हंसो लोगोजो गिरेंगे वही तो संभलेंगेऐसी शोहरत तुम्हे मुबारक़ हो-हमने कब तुमसे कहा! हम लेंगे!जब भी हिम्मत की ज़रुरत होगीएक कोने में जाके रो लेंगे क्यूं ख़ुदा सामने नहीं आताजब मिलेगा, उसीसे प...
ग़ज़ल ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जाढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जारोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जागर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनकोमैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जाहर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-उसको अपनी-सी ल...
बह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिलाफिर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिलाहमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी थादर्द मीठा-सा दवाओं में कोई ऐसा मिलाखो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापस मिलेएक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिलापाके खोना खोके पाना खेल जैसा हो गयालुत्फ़ जीने की स...
संबंधित पिछली पोस्टकल फ़ेसबुक ने सूचना दी कि आपका पासवर्ड रीसेट करने के लिए कोड भेज रहे हैं, अगर यह कोशिश आपने नहीं की तो कृपया बताएं।मैंने बताया।ज़ाहिर है कि मेरा एकाउंट हैक होते-होते बचा।20-12-2018दूसरी घटना आज हुई।2016 के आसपास दो क़िताबें मैंने अमेज़न पर लगाईं थीं।...
ग़ज़लताज़गी-ए-क़लाम को अकसरयूं अनोखा-सा मोड़ देता हूंजब किसी दिल से बात करनी होअपनी आंखों पे छोड़ देता हूंसिर्फ़ रहता नहीं सतह तक मैंसदा गहराईयों में जाता हूंजिनमें दीमक ने घर बनाया होवो जड़ें, जड़ से तोड़ देता हूं08-07-1994कैसी ख़ुश्क़ी रुखों पे छायी हैलोग भी हो गए बु...
हास्य-व्यंग्यमैं एयरपूंछ से फलानी बोल रही हूं, संजय जी बोल रहे हैं ? ‘संजय जी तो यहां कोई नहीं है ! ....’ .......(तिन्न-मिन्न, कुतर-फुतर.....) यहां तो संजय ग्रोवर है..... (आजकल एक साइट भी, जो पहले संजय ग्रोवर के नाम से मेल भेजती थी, संजय जी के नाम से भेजने लगी है,...
पिछला भागपहली क़िताब मैंने पोथी डॉट कॉम पर छापी। छापी क्या वह तो ट्राई करते-करते में ही छप गई। सोचा कि यार देखें तो सही, क्या पता छप ही जाए। काफ़ी मग़जमारी करनी पड़ी पर अंततः क़िताब तो छप गई। काफ़ी कुछ सीखने को मिला पर उससे कहीं ज़्यादा अभी सीखने को बचा हुआ था। ऐसी ही कई...