ब्लॉगसेतु

बहुत पुरानी एक ग़ज़लडूबता हूं न पार उतरता हूंआप पर एतबार करता हूंग़ैर की बेरुख़ी क़बूल मुझेदोस्तों की दया से डरता हूंजब भी लगती है ज़िंदगी बेरंगयूंही ग़ज़लों में रंग भरता हूंअपना ही सामना नहीं होताजब भी ख़ुदसे सवाल करता हूंकरके सब जोड़-भाग वो बोलामैं तो बस तुमसे प्...
हल्का-फ़ुल्कादब्बर सिंद: त्यों बे तालिया! त्या थोत तर आए ते ? ति थरदार भहुत थुत होदा.......तालिया: एक मिनट सरदार, एक मिनट! आप क्या विदेश-यात्रा से लौटे हैं !?दब्बर: अबे त्या बत रहा ए, महीना हो दया झामपुर थे बाहर नितले!तालिया: तो फिर ‘सोचकर आए थे’ ‘सोचकर आए थे’ क्या...
छोटी कहानीवे आए थे।श्रद्धा के मारे मेरा दिमाग़ मुंदा जा रहा था।यूं भी, हमने बचपन से ही, प्रगतिशीलता भी भक्ति में मिला-मिलाकर खाई थी।चांद खिला हुआ था, वे खिलखिला रहे थे, मैं खील-खील हुई जा रही थी।जड़ नींद में अलंकार का ऐसा सुंदर प्रदर्शन! मैंने ख़ुदको इसके लिए पांच अं...
पुरस्कार लेनेवाले की कोई राय हो सकती है, देनेवाले की हो सकती है, लेन-देन और तमाशा देखनेवालों की राय हो सकती है, मगर पुरस्कार ! उससे कौन पूछता है तुम किसके पास जाना चाहते हो और किसके पास नहीं ? पुरस्कार की हालत कुछ-कुछ वैसी ही होती है जैसी तथाकथित भावुक समाजों में क...
वे सब कितने हैं महान जो क़िस्से गढ़ते हैंनक़ली दुश्मन से अख़बारी पन्नों पे लड़ते हैंऊँचे-ऊँचे दिखते हैं जो लोग फ़ासलों सेनीचे गिर कर ही अकसर वो ऊपर चढ़ते हैंजो जहान को फूलों से नुकसान बताते हैंउनकी नाक तले गुलशन में काँटे बढ़ते हैंवे भी जिनसे लड़ते थे उन जैसे हो बैठेअपनी स...
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