ब्लॉगसेतु

"जब बुद्धिजीवी लेखक गधे को गधा कहना छोड़ दे और भेड़िए को मेमना बताना प्रारंभ कर दे, तब समझ लीजिए साहित्य के बुरे दिन चल पड़े हैं।"'लोकतंत्र संवाद मंच''नई प्रतिभाओं की खोज' के अंतर्गत आज हम दो नये रचनाकारों का इस प्रायोगिक मंच पर तहेदिल से स्वागत करते हैं। आप...
जागते रहो!अब चूहे मरे कैसे? ई तो साहेब जी और उनके पिट्ठू लोग जानें! बड़े नेकदिल थे बेचारे, कहते थे यदि अँगूर में सुई चुभो दी जाए तो किशमिश बन जाता है और वो भी दुइ हफ़्तों में।             ससुर हम भी सोचे कि ई तो अमीर बनने का बड़ा ही...
'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' अनोखी पहल है या प्रयोग! अब इसका उत्तर तो हमारे पाठकगण ही दे सकते हैं। आज हम न ही कोई व्यंग्य लेकर आए हैं और न ही कथा क्योंकि 'सबरंग क्षितिज-विधा संगम' का अस्तित्व में आना ही एक अनोखी कथा है! और इन सबसे इतर इस पुस्तक की समीक्षा आदरणीया रेणु...
आदरणीय कक्का,चरणों में प्रणाम स्वीकारिए!हाल-चाल कुशल-मंगल है। हस्तिनापुर की गर्मी बड़ा पसीना बहा रही है। वैसे गांधारी काकी कुंती बहन के साथ मज़े में हैं। परंतु चार दिन पहले गांधारी काकी को एकठो सपना आया रहा और ऊ रतिया में उठकर चिल्लाय पड़ीं! "गो कोरोना जो!""गो को...
 'मुर्ग़ा साहित्यकार एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' ए कक्का! ई शॉक डाउन में बड़ा कड़की मची पड़ी है औरे ख़ाली क़लम घिसाई से बात नहीं बन रही है परंतु आपकी तोंद तो दिनों-दिन आठवें आसमान की ओर बढ़ रही है, ई माजरा क्या है तनिक हमें भी तो सुनाओ! अरे कलुआ तू भी बड़ा नादान...
प्रिय कक्का,चरणों में प्रणाम स्वीकार करें!  इस प्रकार कोरोना नामक धूर्त युद्ध में मारा गया और रामायण, महाभारत के साथ सात समंदर पार कोस्टा रिक्का के वनों में 'सवा सेर गेहूँ' लेने मुंसिपल्टी की लंबी कतार में खड़ा हो गया जहाँ हस्तिनापुर से आये पाँच-पाँच सौ के...
ए कक्का! हमरा हवा-हवाई चप्पल टूट गया है! बड़ा दिक्कत महसूस हो रहा है भागने में। औरे ससुर ई शॉक डाउन में कउनो दुकान भी नहीं खुली है। का करें बड़ा तकलीफ़ में हैं, औरे उधर रोज़ी-रोटी के लाले भी पड़े हैं। परसों ऊ छगनलाल बनिया&nbs...
घनन-घनन, घिर-घिर आये बदरा!घनन-घनन, घिर-घिर आये बदरा! घन-घन घोर कारे छाये बदरा! मन धड़काये बदरवा ....... मन-मन धड़काये बदरवा........ ! का रे कलुआ! काहे फ़ोकट में पगलाये पड़ा है। अरे कक्का! काहे नमक में पानी डारे रहे हो! कभी तो ठीक से जवाब दे दिया करो। हम तो इहे कह...
 इस पवित्र गोबर पर अपने हाथ रखकर कसम खाओ!का हो कक्का! काहे शुतुरमुर्ग की तरह मुँह फुलाये बैठे हो! का तोहरे तबेले में कउनो विशेष बात हो गई!  अरे नाही रे कलुआ! अब तोहसे का बतायें! बड़ा दरद है! कलुआ- "कउन बात का?" "का कौनो चोट-वोट लागी राही!""अरे नाही"&n...
इस माह की चुनी गईं नौ श्रेष्ठ रचनाएं आप सभी के समक्ष वाचन हेतु प्रस्तुत हैं। अगले सप्ताह इन नौ रचनाओं में से सर्वश्रेष्ठ तीन रचनाएं पाठकों द्वारा भेजी गयी टिप्पणी और हमारे निर्णायक मंडल के निर्णय के आधार पर चुनी जायेंगी जिसे हम अगले बुधवारीय अंक में प्रका...