ब्लॉगसेतु

लघुकथाकुछ सफल लोग आए कि आओ तुम्हे दुनियादारी सिखाएं, व्यापार समझाएं, होशियारी सिखाएं।और मुझे बेईमानी सिखाने लगे।अगर मुझे बचपन से अंदाज़ा न होता कि दुनियादारी क्या है तो मेरी आंखें हैरत से फट जातीं।-संजय ग्रोवर05-08-2019
ग़ज़लकोई छुपकर रोता हैअकसर ऐसा होता हैदर्द बड़ा ही ज़ालिम हैऐन वक़्त पर होता हैशेर अभी कमअक़्ल है नाअभी नहीं मुंह धोता हैतुम ही कुछ कर जाओ नावक़्त मतलबी, सोता हैवो मर्दाना नहीं रहायूं वो खुलकर रोता है-संजय ग्रोवर
ग़ज़लये तो हारा हुआ घराना हैइस ज़माने को क्या हराना हैये तो बचपन से मैंने देखा हैये ज़माना भी क्या ज़माना हैवक़्त से दोस्ती करो कैसेवक़्त का क्या कोई ठिकाना हैसच का हुलिया ज़रा बयान करोसच को सच से मुझे मिलाना हैसचके बारे में झूठ क्या बोलूंसच भी झूठों के काम आना हैसचसे ब...
Photo by Sanjay Groverचांद से चिट्ठी आई है के दुनिया आनी-जानी है मंदिर-मस्ज़िद यहीं बना लो, मंज़र बड़ा रुहानी हैगांधीजी का नाम रटो हो, पहने हो जैकेट और कोटलंगोटी के नाम पे फिर क्यूं मरी तुम्हारी नानी हैआधी-पौनी दिखे सचाई,समझा ख़ुदको ज्ञानी हैअंधे कैसे होते होंगे...
ग़ज़ल created by Sanjay Groverसच में या अफ़साने मेंमंटो पागलखाने मेंमंटो, तेरे और मेरेहै क्या फ़र्क़ ज़माने मेंसच लोगों को भाता हैंसिर्फ़ रहे जब गाने मेंझूठ को मैंने खोया हैअपने सच को पाने मेंहर पगले का नाम लिखासच के दाने-दाने में-संजय ग्रोवर02-10-2018
उनसे मैं बहुत डरता हूं जो वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं। इसमें दो-तीन समस्याएं हैं-1.     बाप बनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। ऐसे ज़िम्मेदार बाप का दुनिया को अभी भी इंतेज़ार है जो सोच-समझ के बच्चा पैदा करे। वैसे जो सोचता-समझता होगा...
ग़ज़लcreation : Sanjay Groverसच जब अपनेआप से बातें करता हैझूठा जहां कहीं भी हो वो डरता हैदीवारो में कान तो रक्खे दासों केमालिक़ क्यों सच सुनके तिल-तिल मरता हैझूठे को सच बात सताती है दिन-रैनयूं वो हर इक बात का करता-धरता हैसच तो अपने दम पर भी जम जाता हैझूठा हरदम भीड़ इक...
ग़ज़लBy Sanjay Groverपहले सब माहौल बनाया जाता हैफिर दूल्हा, घोड़े को दिखाया जाता हैजिन्हें ज़बरदस्ती ही अच्छी लगती हैउनको घर पे जाके मनाया जाता हैझूठ को जब भी सर पे चढ़ाया जाता हैसच को उतनी बार दबाया जाता हैदो लोगों में इक सच्चा इक झूठा हैबार-बार यह भ्रम फैलाया जाता हैआ...
बड़ों ने कहा कि अच्छे लोगों में उठो, बैठो।तभी से मैं अकेला रह रहा हूं।-संजय ग्रोवर 17-04-2018
ग़ज़लPHOTO by Sanjay Groverविज्ञों को सम्मान चाहिएचमचों को विद्वान चाहिएजिनके अंदर शक्ति बहुत हैउनमें थोड़ी जान चाहिएबुद्वि थोड़ा कम भी चलेगीबड़े-बड़े बस कान चाहिएपीठ प चढ़के सर पे चढ़ गएसबको ही उत्थान चाहिएआंदोलन भी ख़ूब करेंगेबस कोई मैदान चाहिएअंजुलि में श्रद्धा भर लाओह...