ब्लॉगसेतु

लोगों को बताया गया कि कुछ न कुछ करते रहो, ख़ाली मत बैठो नही तो पागल हो जाओगे.शताब्दियां बीत गई पर लोगों की खोपड़ियों में से यह बात नहीं निकली. अब वे भले पागलपन करते रहें पर ख़ाली कभी नहीं बैठते.-संजय ग्रोवर
पापा अपने बच्चे के साथ घूमने निकले.निकले ही थे कि राह में नाली दिखी.बच्चा तो बच्चा है, बोला-‘‘देखो पापा, कित्ती बदबू! कित्ता कीचड़!’’‘‘हप्प’-पापा ने डांटा, फिर समझाया-‘अपने देश की नाली के बारे में ऐसा थोड़ी बोलते हैं’’‘‘हुम्म‘-बच्चे ने सोचा, फिर बोला-’तो फिर आज घूमने...
व्यवस्था ने निर्णय लिया कि ‘बेईमाना’ को, जहां है वहीं, सील कर दिया जाए।लेकिन स्टाफ़ की कमी के कारण इसके क्रियान्वन में भारी व्यवधान हुआ।हुआ यह कि जिसको भी ‘बेईमाना’ रोकने को भेजा जाता वह ख़ुद ही बेईमान निकलता और ईमानदारी की तरह ग़ायब हो जाता।सुना है कि व्यवस्था अब वि...
‘बड़ी अच्छी  जुगाड लगाई यार तूने, ंि दी  कादमी में लग गया! बधाई हो!’‘तू भी तो हुर्दू कादमी में फ़िट हो गया, तुझे भी बधाई!’‘इसी को तो कहते हैं ं गा-अमुना संस्कृति’‘अब तो पारदर्शिता का ज़माना है, अब तो हम खुलकर इसे कह सकते हैं-ॉग्रेस-ीजेपी संस्कृति’! 
लघुकथाकुछ सफल लोग आए कि आओ तुम्हे दुनियादारी सिखाएं, व्यापार समझाएं, होशियारी सिखाएं।और मुझे बेईमानी सिखाने लगे।अगर मुझे बचपन से अंदाज़ा न होता कि दुनियादारी क्या है तो मेरी आंखें हैरत से फट जातीं।-संजय ग्रोवर05-08-2019
ग़ज़लकोई छुपकर रोता हैअकसर ऐसा होता हैदर्द बड़ा ही ज़ालिम हैऐन वक़्त पर होता हैशेर अभी कमअक़्ल है नाअभी नहीं मुंह धोता हैतुम ही कुछ कर जाओ नावक़्त मतलबी, सोता हैवो मर्दाना नहीं रहायूं वो खुलकर रोता है-संजय ग्रोवर
ग़ज़लये तो हारा हुआ घराना हैइस ज़माने को क्या हराना हैये तो बचपन से मैंने देखा हैये ज़माना भी क्या ज़माना हैवक़्त से दोस्ती करो कैसेवक़्त का क्या कोई ठिकाना हैसच का हुलिया ज़रा बयान करोसच को सच से मुझे मिलाना हैसचके बारे में झूठ क्या बोलूंसच भी झूठों के काम आना हैसचसे ब...
Photo by Sanjay Groverचांद से चिट्ठी आई है के दुनिया आनी-जानी है मंदिर-मस्ज़िद यहीं बना लो, मंज़र बड़ा रुहानी हैगांधीजी का नाम रटो हो, पहने हो जैकेट और कोटलंगोटी के नाम पे फिर क्यूं मरी तुम्हारी नानी हैआधी-पौनी दिखे सचाई,समझा ख़ुदको ज्ञानी हैअंधे कैसे होते होंगे...
ग़ज़ल created by Sanjay Groverसच में या अफ़साने मेंमंटो पागलखाने मेंमंटो, तेरे और मेरेहै क्या फ़र्क़ ज़माने मेंसच लोगों को भाता हैंसिर्फ़ रहे जब गाने मेंझूठ को मैंने खोया हैअपने सच को पाने मेंहर पगले का नाम लिखासच के दाने-दाने में-संजय ग्रोवर02-10-2018
उनसे मैं बहुत डरता हूं जो वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं। इसमें दो-तीन समस्याएं हैं-1.     बाप बनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। ऐसे ज़िम्मेदार बाप का दुनिया को अभी भी इंतेज़ार है जो सोच-समझ के बच्चा पैदा करे। वैसे जो सोचता-समझता होगा...