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अभिव्यक्ति और संवाद की पहली विधा गद्य है।साधारणतया मनुष्य के छंद रहित बोलने पढ़ने की साधारण व्यवहार की भाषा को गद्य कहा जाता है।पर ऐसा कहना गद्यकार की सृजनात्मक गुण की अवहेलना होगी।सुगठित शब्द और सटीक भाव संप्रेषण के द्वारा की गयी विशिष्ट छंदविहीन अभिव्यक्ति&nb...
 पोस्ट लेवल : पहला अंक....छुट-पुट
मौन भी मुखरितसाथ रहे जब राधा और श्यामकंगन बिछुआ, पायल छनके  ‎संग मुरली के तानमगन प्रेम में बिसराये कब भोर से हो गयी साँझनैन की आँख-मिचौली में क्या बतियाने का कामपात कदंब के ले हिलकोरे जमना बैठी लहरे थाम हवा राग...
 पोस्ट लेवल : मौन भी मुखरित
शीघ्र वापसीनये कलेवर मेंनया रंग लिए सब के साथइन्तजार करिए
 पोस्ट लेवल : कमिंग बैक
रुको ! जरा ठहरो।मत डालो खलल मेरी नींदों मेंअभी ही तो मैंने सपनों के बीज बोए हैंअभी ही तो ख्वाबों के अंकुर फूटे हैंउम्मीदों की नर्म गीली मिट्टी परअभी ही तो हसरतों की कलियां गुनगुनाई हैंतितलियाँ खुशियों को अभी उड़ने तो दोरंगत उपवन की निखर जाने दोमत डालो खलल मेरी नींदो...
 पोस्ट लेवल : पूजा पूजा गूगल+
ये रात ये तन्हाईये दिल के धड़कने की आवाज़ये सन्नाटाये डूबते तारॊं की खा़मॊश गज़ल खवानीये वक्त की पलकॊं पर सॊती हुई वीरानीजज्बा़त ऎ मुहब्बत कीये आखिरी अंगड़ाई बजाती हुई हर जानिब ये मौत की शहनाई सब तुम कॊ बुलाते हैंपल भर को तुम आ जाओबंद होती...
जलता है यह जीवन पतंगजीवन कितना? अति लघु क्षण,ये शलभ पुंज-से कण-कण,तृष्णा वह अनलशिखा बनदिखलाती रक्तिम यौवन।जलने की क्यों न उठे उमंग?हैं ऊँचा आज मगध शिरपदतल में विजित पड़ा,दूरागत क्रन्दन ध्वनि फिर,क्यों गूँज रही हैं अस्थिरकर विजयी का अभिमान भंग?इन प्यासी तलवारों से,इ...
 पोस्ट लेवल : जयशंकर प्रसाद
मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम;एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम;आँसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर;मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम;जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी;जिस्मों को चाँदनी में भिगोया करेंगे हम;गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी "क़तील";साहिल पे कश्तियों...
 पोस्ट लेवल : क़तील शिफ़ाई
माना उम्मीद पर जीने से हासिल कुछ नही लेकिन पर ये भी क्या,कि दिल को जीने का सहारा भी न दें।उजडने को उजडती है बसी  बसाई बस्तियां पर ये भी क्या के फकत एक आसियां भी ना दे। खिल के मिलना ही है धूल मे जानिब नक्बतपर ये क्या के खिलने को गुलिस्तां भी न दे...
 पोस्ट लेवल : कुसुम कोठारी
विश्व महिला दिवस पर विशेषतुम्हें क्या लगता हैमुझे शाखों से गिरने का डर हैतुम्हें ऐसा क्यूँ लगता हैकैसे लगता हैतुमने देखा न होपर जानते तो होमैं पतली टहनियों से भी फिसलकर निकलनाबखूबी जानती हूँ ....डर किसे नहीं लगताक्यूँ नहीं लगेगाक्या तुम्हें नहीं लगता ...तुम्हें लगत...
हर सांस के साथ पहलू में धड़कता मेरा दिल,धड़कन में तुम एहसास कराती कि मैं हूँ अभी।तन्हाई से डर कर मेरा आँखें बंद कर लेना,तसव्वुर में परछाई दिखाती कि मैं हूँ अभी।ख़ुद में करना तफ़्सील से तलाश ख़ुद को,अन्दर से वही आवाज़ आती कि मैं हूँ अभी।घबरा के ख़ामोशी के आगोश में सोता जब,...