ब्लॉगसेतु

दरख़्तों पर नये पत्तेहरे होने लगे हैं लॉन चटखती महकती कलियाँ चमकती धूप, हल्की हल्की तपिश धीमे धीमे से बहती सर्द हवा खुला खुला सा नीला आकाश वापसी मौसमी परिंदों की गर्म कपड़ों में सैर करते बुज़ुर्गसब तरफ़ फूल खिलने वाले हैं मगर, अचानक,...
साँसों से नहीं जाती है जज़्बात की ख़ुशबूयादों में घुल गयी है मुलाकात की ख़ुशबूचुपके से पलकें चूम गयी ख़्वाब चाँदनीतन-मन में बस गयी है कल रात की ख़ुशबूनाराज़ हुआ सूरज जलने लगी धरा भीबादल छुपाये बैठा है बरसात की ख़ुशबूकल शाम ही छू गये अपनी आँखों से मुझेहोंठों में रच गयी तेर...
 पोस्ट लेवल : श्वेता सिन्हा
हजारों आँसू सैकड़ों गमआँखें नही दिल भी है नमआकर भर लो ना बाँहों मेतुम बिन तनहा रह गए हमवो क्या जाने इश्क का मतलबरोज बदलते हैं जो हमदमराख से हो सारे गए अरमाँदिल ये जला है मद्धम-मद्धमदर्द हुआ है कम सा अब तोबरसी है आँखे यूँ भरदम– रूचि शाही
कर्तव्य के पुनीत पथ कोहमने स्वेद से सींचा है,कभी-कभी अपने अश्रु और—प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—हम कभी रुके नहीं हैं।किसी चुनौती के सम्मुखकभी झुके नहीं हैं।आज,जब कि राष्ट्र-जीवन कीसमस्त निधियाँ,दाँव पर लगी हैं,और,एक घनीभूत अंधेरा—हमारे...
हारा हूँ तो क्या हारा,जीवन भी तो मृत्यु के आगे एक दिन हारता ही है! इस हार में भी अगर मैं विचलित नहीं,तो संसार मैंने जीता है!गिर कर कोई कितना गिर सकता है ,सिर्फ़ और सिर्फ़ इस धरातल पर,जो कि सबका आधार है!स्वयं को पुनः आत्मनियंत्रित कर,कर आत्मकेन्द्रित!पहुंच अ...
1.पलाश-वन पद्मिनी का मानो जौहर-यज्ञ।2.तुम्हारी होली!शहीद हुए देखो पलाश-पुष्प।3.पलाश-वनबन गई देह येतुम्हारे बिन।4.जाने कब सेऔर किससे जलेपलाश–प्रेमी।5.लाल -पीले हैंजन्म से ही क्रोधितपलाश–पुष्प।6.पलाश-पुष्पमानो नव-वधुएँसभा में साथ।-ज्योत्सना प्रदीप
फागुन छायो अब बसंत पर फगुनायौ अम्बर आकाश अबीर गुलाल भर घट के भीतर दियो उंडेल उषा नभ आज ! चटख केसरी रंग घुल गयो थोड़ो टेसू दिनो डार नव लाजवंती नार सरीखो अम्बर सजो धजो सो जाय ! नीलाम्बुज ने ओढ़ी चुनर हरीत पात की बूटी छायजल...
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है,टकराकर वो चट्टानों से फिर थोड़ा सम्भलती है।किसी नवजात बच्चे ने लिया हो जन्म जैसे कि,हर्षित हो बड़े ही वेग से फिर वो नीचे उतरती है॥बनाती राह ख़ुद अपनी सँवारे ज़िन्दगी सबकी,पाले गोद में सबको करे ना बात वो मजहब की।करे शीतल मरुस्थल...
आंखों का दरिया छुपाने के लियेमुस्कुराते  हैं      जमाने  के लिये ।।बात दिल की अब समझता है कौनजायें किसको गम दिखाने के लिये ।।हां, हमे मजबूत होना ही पड़ाराह से पत्थर  हटाने के लिये  ।।सर झुकाना मंजूर कर "आरती "फ़ासले दिल के मिटाने...
मैली कुचैली बोरी ठूँस-ठूँस कर भरे जानेवाले कचरे ---जूठन और भी बहुत कुछ !उन्हें बटोरते नन्हे हाथ बचपन के।खेल नहीं खिलौने नहींकूड़े को उलीचती उँगलियाँ गंदगी से खुजलाता बदन फेंके जूठे केक और बिस्कुट छीनने को आतुर श्वानक्रंदन करता अन्तर्मन!...