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 पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज  दुनिया को अलविदा कह गई भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 में अंबाला में हुआ था राजनीति में आने से पहले सुषमा सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता के पद पर काम करते हैं साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी के द्व...
जब नए शिक्षण संस्थान में दाखिला लेने के बाद नए माहौल में नए टीचर के साथ-साथ नए सीनियर भी मिलते है तो सीनियर कैसे होगें? ये सवाल जहन में ठीक उसी प्रकार कौंधता है जिस प्रकार आसमान में बिजली। और मैं तो जब शिक्षा के लिए पलायन कर शहर की हवाओं से रूबरू हुआ तब तक तो जूनिय...
स्वाभाविक सी बात है कि सीनियर का नाम सुन मन में रैगिंग का डर अपना ख्याल ला देता है लेकिन ये जरूरी नहीं कि हर सीनियर रैगिंग ही लेता हो, कुछ सीनियर ऐसे भी होते जो सोचने पर मजबूर कर देते। यूजी तक तो जूनियर सीनियर की परिभाषा से एकदम अनजान था बस रैगिंग के बारे में दीवार...
घड़ी की सुई से कदमताल मिलकर निरन्तर चलने वाला वक्त अपने साथ बदलाव को भी सृजित करता चला जाता है जो वर्तमान पर आधुनिकता की पोशाक लिपेट कर भाविष्य को संभावनाओं में लपेट कर अतीत को इतिहास में समेट जाता है। इस बदलाव की चपेट में कुछ ऐसी भी चीजें आ जाती है जिन पर हमें गर्व...
जी हम बात कर रहे है उस समाज की जिस समाज के हिस्सा आप भी है, उस समाज की जहॉ स्त्री को तो खुलकर रोने की आजादी है लेकिन पुरूषों को नहीं, हम बात कर रहे उस सामज की जिसके मुॅह में तो सामानता के बड़े-बड़े भाषण है मगर बगल में वही पुरानी सोच। सब छोड़िये हम बात कर रहे पुरूष प्र...
जी हां, समाज में आज भी ऐसे उदाहरण है जो हौसले और जज्बे को परिभाषित कर रहे है और प्ररेणा दे रहे है कि इंसान अपनी किस्मत खुद लिखता है। अपना भाग्य वह खुद रचता है। वैसे तो वक्त की मार ने अच्छे-अच्छे को हार मानने को मजबूर कर दिया, पर आज जिनकी बात हम कर रहे उन्होंने वक्त...
कहीं पढ़ा था कि लड़की जब तक गुनाहगार नहीं होती जब तक वह आरोपी साबित नहीं हो जाता और लड़के तब तक दोषी होते जब तक निर्दोष साबित नहीं हो जाते। पढ़ने में ये लाइनें जितनी गहराई से दिल को छू जा रही उतनी ही मजबूती के साथ यही पक्तियां हमारी मानसिकता और हमारी व्यवस्था की बखेड़िय...
बड़े-बड़े सृजनकर्ताओं का मानना है कि एक लेखक अपनी रचनाओं को स्वंय जीता है, बात सौ फीसदी सही लगती है लेकिन आज जो लिख रहे उसमें कुछ अचरज सा है, कुछ हकीकत है तो कुछ फसाना है क्योंकि अभी तक भूत होने और डर जाने की गुत्थी में खुद उलझे हुए है और ऐेसे में ही इनके डर से बचने...
 पोस्ट लेवल : आलेख
थोड़ा अटपटा जरूर लग रहा हो कि खुशहाली को जीनें और सीखने के लिए स्कूल भी होंगे? जी हां, सही पढ़ रहे है अतीत के आंकड़ो के स्तम्भ को धराशाई कर वर्तमान खुशहाली के नये आंकड़ो को गढ़ भविष्य में ऐसे स्कूल खोलने के अवसरों को बड़े ही जोरों-शोरों से न्यौता दे रहा है जहॉ खुशियों को...
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