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वराह मतलब जो उत्‍तम आहार लेता हो  वैदिक संस्‍कृत में वराह का मतलब होता है जो उत्‍तम आहार लेता हो। यास्‍क के अनुसार मेघ वराह है क्‍योंकि यह जल जैसा उत्‍तम भोजन करता है। उत्‍तम आहार करने वाला ब्राहृमण की भी एक उपाधि वराह है। जमीन से उत्‍तम कंद-मूलों को खोद...
 पोस्ट लेवल : मंगल वराह यज्ञ
सिंह मतलब संहाय  यास्‍क रचित निरूक्‍त में प्रस्‍तुत वैदिक शब्‍दों की व्‍युत्‍पत्तियों से गुजरना रोचक है। उससे पता चलता है कि वैदिक काल के पूर्व किस तरह शब्‍दों ने आकार पाया होगा। जैसे कुएं के लिए प्रयुक्‍त शब्‍द कूप की व्‍युत्‍पत्ति है - कू प। मतलब जिससे पा...
नरक यानि नीचे जाना  वैदिक शब्‍दों की जानकारी के लिए ईसा पूर्व छठी सदी में हुए यास्‍क का निरूक्‍त व निघण्‍टु सबसे पुराने ग्रंथ हैं। निरूक्‍त में वैदिक शब्‍दकोष निघण्‍टु के शब्‍दों की व्‍याख्‍या है। इनमें शब्‍दों के मूल अर्थों को जानने का रोचक प्रयास है। जैस...
गौ के निहितार्थ  वैदिक संस्‍कृत के शब्‍द बताते हैं कि उनका निर्माण और नामकरण जीवों और वस्‍तुओं की गति के संदर्भ में किस तरह हुआ होगा ! वेदों में गौ शब्‍द गमन यानि चलने और गति के अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ है। यह किरण का पर्याय है क्‍योंकि किरण चलकर धरती तक आती ह...
जिनका आज तुमने एनकाउंटर किया या कल को जिन्‍हें तुम फांसी दे दोगेया  फांसी के लिए ढूंढ़ रहे होगेहैदराबाद के वे चार लड़केया रांची के बारह लड़केया देश के लाखों लड़केक्या  वे तुम्हारे इस विश्व गुरुकुल केसदस्य नहीं हैंक्‍या उनका चिन्‍मयानंद, सेंगर आदि से कोई र...
 पोस्ट लेवल : एनकाउंटर
हां जी, मैं कवि‍ता लिखना सिखा सकता हूं।पर यह आपके कवि होने की गांरटी नहीं देता।क्‍योंकि कवि होना आपकी ग्रहणशीलता पर निर्भर करता है कि कुछ देखते, सुनते समय आप अपने अनुभव को, आकलन को उसकी बहुआयामिता में ग्रहण​​​​ कर पाते हैं उसकी गहराई में देख पाते हैं और उसे उसी...
वैश्विक हताशा की परिणतियों का दस्‍तावेज वैश्वीकरण की चमकीली आँधी अब अपने तीसरे दशक की आख़िरी पारी खेल रही है। कारपोरेट लालच और उपभोक्तावाद चरम पर हैं। जो लोग बाज़ार के गृहप्रवेश से सदमे में थे वे अब अपने मोबाइल  फ़ोन के स्क्रीन पर तरह-तरह की चीजें देखकर गूँगे...
 'समय की साजिश के बाद' की कविताओं से गुजरते कुछ नोट्ससारे वर्तमान कोकल्पित यज्ञ में होमकररक्‍तबीज आशा की राख मेंनेवलों की तरह लोटने लगते हैं लोग,किसी का भी बदन सुनहरा नहीं होता।अपने समय की सहज, शास्‍त्रीय और समर्थ आलोचना हैं बसन्‍त जैतली की कविताएं। बसंत जी सं...
तीस साल पहलेभाषा के आंगन मेंतेरे मुकाबिल होनानिज की आश्‍वस्‍ती की तरह थाकि भीतर के अंधेरे को जाननेऔर उसे उर्जा में बदलने का तेरा हुनरआज भी साथ है मेरेतेरे बाद मैंउस अहाकवि से भी मिलाजिसने किसी स्‍टेशन परतुम्‍हारे द्वारा दी गयी पूड़ी सब्‍जी कोतुम्‍हारी आंख बचा पटरी...
''मौत ने बनाया मुझसे फरेब का कोई रिश्‍ता'' जैसी पंक्ति‍यां लिखने वाले अग्रज कवि पंकज सिंह जैसे जानते थे मृत्‍यु को, कि कैसे 'मृत्‍यु अपना चेहरा छिपाये आती है। अपनी प्रिय चरागाहों में'। इसलिए हीमोफिलिया और हृदय रोग के घेरे में रहकर भी हर पल को वो जिन्‍दादिली से...