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 बसंत जैतली की कविताएं 'समय की साजिश के बाद' की कविताओं से गुजरते कुछ नोट्ससारे वर्तमान कोकल्पित यज्ञ में होमकररक्‍तबीज आशा की राख मेंनेवलों की तरह लोटने लगते हैं लोग,किसी का भी बदन सुनहरा नहीं होता।अपने समय की सहज, शास्‍त्रीय और समर्थ आलोचना हैं बसन्‍त जैतली...
 पोस्ट लेवल : बसंत जैतली
अंजना टंडन के पहले कविता संकलन ' कैवल्य ' से गुजरना लगातार रूखी होती जाती भाषाई दुनिया में आत्मीयता का एक द्वीप पा लेने जैसा है, जहां आप पल दो पल रुककर सांसें ले सकते हैं, आश्वस्त हो सकते हैं कि प्रेम और जीवन की अनंतता के छोर तक हमारी पहुंच बनाने वाली रचनाएं अभ...
 पोस्ट लेवल : अंजना टंडन
नगाड़े की तरह बजते हैं शब्‍द - निर्मला पुतुलदुख-तंत्र - बोधिसत्‍वचुप्‍पी का शोर - संजय कुंदनकोई नया समाचार - प्रेमरंजन अनिमेषक्‍या तो समय - अरूण देवसहसा कुछ नहीं होता - बसंत त्रिपाठीज्ञानपीठ ने युवा कविता के छह हस्‍ताक्षरों को एक  साथ प्रकाशित किया था 2004 में...
मिथिलेश कुमार राय की कविताएं अपने समय, समाज और लोक को पुनर्परिभाषित करती आत्‍मीय व आश्‍वस्त करती कविताएं हैं। ये कविताएं जिस सहजता और धैर्य को सामने लाती हैं वह वर्तमान युवा कविता में दुर्लभ है - साइकिल चलाना मैंने बचपन में ही सीख लिया थाकोई सीखने निकलता था तो मै...
''आखिरी गेंद'' कथाकार राम नगीना मौर्य का पहला कहानी संग्रह है। इस संग्रह की कहानियां निम्‍न मध्‍यवर्गीय जीवन को उसके विभिन्‍न आयामों के साथ अभिव्‍यक्‍त करती हैं। मौर्य की अधिकांश कहानियां अपने परिवेश का मुआयना करती उनकी स्थिति का आकलन करती सी लगती हैं, जैसा कि लघु...
'चिराग-ए-दैर (मंदिर का दीया)' मिर्जा गालिब की बनारस पर केंद्रित कविताओं का संकलन है जिसका मूल फारसी से सादिक ने अनुवाद किया है। चिराग-ए-दैर की कविताओं से गुजरते लगता है जैसे बनारस ने गालिब को भी अपने रंग में रंग दिया था - 'बैठकर काशी में / अपना भूल काशाना (छोटा सा...
 पोस्ट लेवल : गालिब कुमार मुकुल
शोध पुस्‍तक 'हिंदी में समाचार' के बाद 'बेखुदी में खोया शहर एक पत्रकार के नोट्स' पत्रकार अरविंद दास की दूसरी पुस्‍तक है। इसमें दास की देश-विदेश घूमते देखी गयी साहित्‍य, समाज, सिनेमा, गांव, देहात की दुनिया के बारे में संक्षिप्‍त रोचक टिप्‍पणियां हैं जिसमें शंघाई चीन...
 पोस्ट लेवल : अरविंद दास
अदनान की कविताओं से गुजरना अपने समय के लोक से गुजरना और उसकी त्रासदियों को जानते हुए उसकी लाचारी को अपनी लाचारी में बदलते देखना है। ये सहज काव्‍य‍कथाओं सी हैं जिनमें काव्‍य में विमर्श की परंपरा आगे बढती है। उनकी 'किबला' कविता को पढते अपनी मां, चाचियां याद आयीं। 'मा...
''आवाज भी देह है'' युवा कवि ''संजय कुमार शांडिल्‍य'' का पहला कविता संग्रह है। कवि के बारे में मनोज छावड़ा का कहना सही है कि - कविताएं कथ्‍य और शिल्‍प की दृष्टि से बेजोड़ हैं।' संग्रह की पहली कविता 'हिलती हुई पृथ्वि' की पंक्तियां हैं -मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता...
कविता के लिए संवेदनशीलता के साथ जो बात जरूरी है वह है कवि के भीतर एक सच्‍ची जिद का होना, जो उसकी संवेदना को उसके सही संदर्भों में रूपाकार दे सके। युवा कवि रेवन्‍त दान बारहठ की कविताओं में वह सच्‍ची जिच बारहा अभिव्‍यक्‍त होती है। अपनी कविता अरदास में वे मां से कहत...
 पोस्ट लेवल : शमशेर रेवन्‍त