ब्लॉगसेतु

आखिर मनुष्य ही होती है ये वेश्याक्यों नहीं समझता समाज इनको अपना हिस्सा - क्यों किया इनको तुम ने दरकिनारअपनी भूख मिटाने के लिए बना लेते हो इनको अपना नहीं तो इनके कोठे (घर) को भी तुम गाली देते हो आखिर क्यों सुनो शायद वह कोठा नहीं घर...
आखिर कब तक मुझे यूं ही नफरत करोगे।मिट्टी में मिलने के बाद तो एक दिन तुम याद करोगे।आखिर कब तकअपने दिल की धड़कनों से मुझे दूर करोगे।सांसे रुक जाने के बाद तोअपनी धड़कनों में तोएक दिन मुझे सुनोगे।आखिर कब तक मेरे दर्द पर मुस्कुराओ गए।बेदर्द दुनिया से दर्द मिलने परएक दिन...
इंसान कमल फूल की तरह जियोंक्योंकि-कमल फूल कीचड़ में खिलता है,लेकिन सभी इंसान  उसे चाहने लगती है;इसलिए कि अपने दु:ख में रहता है दुसरे के उपयोग में आता है ।इंसान यदि बनना है कमल फूल की तरह बनोंअपने लाख दु:ख में भी दुसरे की उपहार सेमत भागों,तब तो इंसान कमल फूल की...
मेरे यहाँ एक नया नया मन्दिर खुला है,नाम हालांकि प्राचीन रखा है।लालची लोग आएं जल्दी - जल्दीमन्दिर को प्राचीन बनाये जल्दी - जल्दीइसलिए भंडारा सुबह-शाम चला रखा है।लालची लोग जाते हैं कुछ मांगनेऔर देकर आ जाते हैं यह भी नहींविचारते जिससे खुद मांगने जा रहे हैंउसे भला क्या...
मैं लिखूं के ना लिखूं ,मुझपर दबाव है किमैं उनके हक में लिखूंमेरी कलम सदा विरोध।मैं लिखूं के ना लिखूं ,क्या चुप हो जाऊंमान लूं इसे खुदा फरमानजिये जाऊं चुपचाप।मैं लिखूं के ना लिखूं ,मुझे डर है कहीं देखमेरे शब्द समझ जाएंमेरे भीतर के डर को।मैं लिखूं के ना लिखूं ,पल पल...
अपनों का ये कैसा मंज़र देख रहा हूँ,मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।जिनके आँगन में गूंजती थी कभी,मेरे बचपन की किलकारियां,वहां आज अपनी जवानी को सिसकता देख रहा हूँ,मैं आज रिश्तों को बिखरता देख रहा हूँ।कभी था जिस घर में वो मंज़र प्यार का,आज उन्ही के हाथों में,नफ़रत क...
अक्सर ऐसा होता हैजब दो "जन" बात करते हैंएक रिश्ता बन जाता हैफिर प्रेम भरी तकरार कासमाँ बन्ध सा जाता हैउम्मीद जुड़ जाती हैकही निराशा हो जाती है"उसकी" फ़िक्र भीतर साँस लेती हैअक्सर ऐसा होता है...ख्याल सो जाते हैंनींद जागती रहती है...आँखे नम हो जाती हैकुछ थम सा जाता हैस...
चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती हैरंगों का भी मतलब जानती है कलाई का फर्क जानती हैनीली,पीली,हरी,गुलाबी,नारंगी रंगों की होती है चूड़ियाँ पर इसमें लाल रंग जो है न वो चूड़ी होने से पहले अपने रंग की कद्र जानता हैअपने रंग की हद जानता हैये नाजुक कलाईयों में...
मैं चाहती थी एक कविता लिखनापर वो शब्द आते नहीं मेरे ज़हन मेंजो बयां कर सके उन संवेदनाओ को,जो महसूस होती हैं उन हर एक माता-पिताओं को,जिनके नोनिहालों ने ऑक्सीजन की कमी सेतोड़ दी थीं सांसे, छोड़ दिया था शरीर,और चले गए इस दुनिया से कहीं बहुत दूर।जिनकी उम्मीदें पंख लगने से...
उसे मेरी याद तो आती होगीजब चाँद की आग़ोश में सूरज छुप जाता होगा नदी की घाट से हर शख्स़ घर को लौट जाता होगा रेत पर लिखा हर नाम, मिट जाता होगा उसकी परछाई भी लम्बी हो जाती होगी हर रोज छत पर शाम जो आती होगी उसे मेरी याद तो आती होगी॥झट–पट गुस्से...