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हुआ सूर्य का संक्रमण, मकर राशि में आज।मने पर्व सक्रांति का, ले कर पूरे साज।।शुचिता तन मन की रखें, धरें सूर्य का ध्यान।यथा शक्ति सब ही करें, तिल-लड्डू का दान।।सुख वैभव सम्पत्ति का, यह पावन है पर्व।भारत के हर प्रांत में, इसका न्यारा गर्व।।पोंगल, खिचड़ी, लोहड़ी, कहीं बि...
(8 भगण 211)भीतर मत्सर लोभ भरे पर, बाहर तू तन खूबसजावत।अंतर में जग-मोह बसा कर, क्यों भगवा फिर धार दिखावत।दीन दुखी पर भाव दया नहिं, आरत हो भगवानमनावत।पाप घड़ा उर माँहि भरा रख, पागल अंतरयामिरिझावत।।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया20-11-18
(122×7  +  12)दया का महामन्त्र धारो मनों में, दया से सभी को लुभाते चलो।न हो भेद दुर्भाव कैसा किसी से, सभी को गले से लगाते चलो।दयाभूषणों से सभी प्राणियों के, उरों को सदा ही सजाते चलो।दुखाओ दिलों को न थोड़ा किसी के,  दया की सुधा को बहाते चलो।बासुदेव अग्...
घनाक्षरी पाठक या श्रोता के मन पर पूर्व के मनोभावों को हटाकर अपना प्रभाव स्थापित कर अपने अनुकूल बना लेनेवाला छंद है। घनाक्षरी में शब्द प्रवाह इस तरह होता है मानो मेघ की गर्जन हो रही हो। साथ ही इसमें शब्दों की बुनावट सघन होती है जैसे एक को ठेलकर दूसरा शब्द आने की जल्...
शिल्प~8888,अंत में लघु-लघुजब की क्रिकेट शुरु, बल्ले का था नामी गुरु,जीभ से बैटिंग करे, अब धुँवाधार यह।न्योता दिया इमरान, गुरु गया पाकिस्तान,फिर तो खिलाया गुल, वहाँ लगातार यह।संग बैठ सेनाध्यक्ष, हुआ होगा चौड़ा वक्ष,सब के भिगोये अक्ष, मन क्या विचार यहबेगाने की ताजपोशी...
रुबाई-1दिनकर सा धरा पर न रहा है कोई;हूँकार भरे जो न बचा है कोई;चमचों ने है अधिकार किया मंचों पे;उद्धार करे झूठों से ना है कोई।रुबाई-2जीते हैं सभी मौन यहाँ रह कर के;मर रूह गई जुल्मो जफ़ा सह कर के;पत्थर पे न होता है असर चीखों का;कुछ फ़र्क नहीं पड़ता इन्हें कह कर के।रुबा...
छमक छम छम छमक छम छम बजी जब उठ तेरी पायल,इधर कानों में धुन आई उधर कोमल हृदय घायल,ठुमक के पाँव जब तेरे उठे दिल बैठता मेरा,बसी मन में ये धुन जब से तेरा मैं हो गया कायल।(1222×4)*********चाँदनी रात थी आपका साथ था, रुख से पर्दा हटाया मजा आ गया।आसमाँ में खिला दूर वो चाँद...
(1)पीप्यालीचाय कीमतवाली,कार्यप्रणालीहृदय की हुईहोली जैसी धमाली।(2)लेचुस्कीचाय की,मिटी खुश्की,भागी झपकीस्फूर्ति दे थपकीछायी खुमारी हल्की।(3)येचायहै नशा,बिगाड़तीतन की दशा,पर दे हताशा,जब तक अप्राप्त।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया24-06-19
5-7-5 वर्णआँख में फूल,तलवे में कंटक,प्रेम-डगर।**मुख पे हँसी,हृदय में क्रंदन,विरही मन।**बसो तो सही,यदि तुम हो स्वप्न,तो चले जाना।**आज का स्नेहउफनता सागरतृषित देह।**शब्द-बदलीकाव्य-धरा बरसीकविता खिली।**आया चढ़ावाबंदरों का कलेवाईश्वर भूखा।**बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिय...
5-7-7-5-7-7 वर्णहम स्वदेशीअपनों का न साथघर में भी विदेशी;गया बिखर,बसा बसाया घर!कोई न ले खबर।**बड़े लाचार,गैरों का अत्याचार,अपनों से दुत्कार;सोची समझीसाजिश के शिकार,कहाँ है सरकार?**हम ना-शाद,उनका ये जिहादभीषण अवसाद;न प्रतिवादखो जाये फरियाद,हाय रे सत्तावाद।**(मेरठ में...