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7 भगण (211) की आवृत्ति के बाद 2 गुरुमाँ दुर्गा (1)पाप बढ़े चहुँ ओर भयानक हाथ कृपाण त्रिशूलहु धारो।रक्त पिपासु लगे बढ़ने दुखके महिषासुर को अब टारो।ताण्डव से अरि रुण्डन मुण्डन को बरसा कर के रिपु मारो।नाहर पे चढ़ भेष कराल बना कर ताप सभी तुम हारो।।=====माँ दुर्गा (2)नेत्र...
सवैया चार चरणों का वार्णिक छंद है जिसके प्रति चरण में 22 से 26 तक वर्ण रहते हैं। चारों चरण समतुकांत होते हैं। सवैया किसी गण पर आश्रित होता है जिसकी 7 या 8 आवृति रहती है। इन्ही आवृतियों के प्रारंभ में एक या दो साधारणतया लघु वर्ण और अंत में एक या दो लघु गुरु वर्ण जोड़...
'यरता' लघु 'भजसा' गुरो, आदि मध्य अरु अंत।'ना' लघु सब 'मा' गुरु सभी, गण विचारते संत।।गण विचार कैसे करें:-कुल गण 8 होते हैं, तथा किसी भी गण में 3 वर्ण होते हैं। उस वर्ण की मात्रा या तो दीर्घ (2) होगी अन्यथा लघु (1) होगी।'यरता' लघु सूत्र से अक्षर के अनुसार 3 गण दिग्दर...
दोहों के मुख्य 21 प्रकार हैं। ये 21 भेद दोहे में गुरु लघु वर्ण की गिनती पर आधारित हैं। किसी भी दोहे में कुल 48 मात्रा होती हैं। दो विषम चरण 13, 13 मात्रा के तथा दो सम चरण 11, 11 मात्रा के। दोहे के सम चरणों का अंत ताल यानि गुरु लघु (2,1) वर्ण से होना आवश्यक है। अतः...
प्रथम जनवरी क्या लगी, काम दिये सब छोड़।शुभ सन्देशों की मची, चिपकाने की होड़।।पराधीनता की हमें, जिनने दी कटु पाश।उनके इस नव वर्ष में, हम ढूँढें नव आश।।सात दशक से ले रहे, आज़ादी में साँस।पर अब भी हम जी रहे, डाल गुलामी फाँस।।व्याह पराया हो रहा, मची यहाँ पर धूम।अब्दुल्ला...
दोहा एक अर्धसम मात्रिक छन्द है। जिसमें 13,11 और 13,11 मात्रा की दो पंक्ति और प्रत्येक पंक्ति में 2 चरण होते हैं। 13 मात्रा के चरण को विषम चरण कहा जाता है और 11 मात्रा के चरण को सम चरण कहा जाता है। दूसरे और चौथे चरण यानि सम चरणों का समतुकान्त होना आवश्यक है।विषम चरण...
जीवों की हिंसा प्राणी क्यों, हो करते।तेरे कष्टों से ही आहें, ये भरते।।भारी अत्याचारों को ये, झेल रहे।इन्सां को मूकों की पीड़ा, कौन कहे।।कष्टों के मारे बेचारे, जीव सभी।पूरी जो ना हो राखे ना, चाह कभी।।जो भी दे दो वो ही खा के, मस्त रहे।इन्सां तेरे दुःखों को क्यों, मूक...
हुई नोट बन्दी ठगा सा जमाना।किसी को रुलाना किसी को हँसाना।।कहीं आँसुओं की झड़ी सी लगी है।कहीं पे खुशी की दिवाली जगी है।।इकट्ठा जिन्होंने किया वित्त काला।उन्हीं का पिटा आज देखो दिवाला।।बसी थी जहाँ अल्प ईमानदारी।खरे लोग देखो सभी हैं सुखारी।।कहीं नोट की लोग होली जलाते।क...
दो भक्ति मुझे कृष्णा।मेटो जग की तृष्णा।।मैं पातक संसारी।तू पापन का हारी।।मैं घोर अनाचारी।तू दिव्य मनोहारी।।चाहूँ करुणा तेरी।दे दो न करो देरी।।वृंदावन में जाऊँ।शोभा ब्रज की गाऊँ।।मैं वेणु सुनूँ प्यारी।छानूँ धरती न्यारी।।गोपाल चमत्कारी।तेरी महिमा भारी।।छायी अँधियारी...
सुखद बसंत पंचमी।पतझड़ शुष्कता थमी।।सब फिर से हरा-भरा।महक उठी वसुंधरा।।विटप नवीन पर्ण में।कुसुम अनेक वर्ण में।।खिल कर झूमने लगे।यह लख भाग्य ही जगे।।कुहुक सुनाय कोयली।गरजत मन्द बादली।।भ्रमर-गुँजार छा रही।सरगम धार सी बही।।शुभ ऋतुराज आ गया।अनुपम चाव छा गया।।कलरव दिग्दिग...