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जीवों की हिंसा प्राणी क्यों, हो करते।तेरे कष्टों से ही आहें, ये भरते।।भारी अत्याचारों को ये, झेल रहे।इन्सां को मूकों की पीड़ा, कौन कहे।।कष्टों के मारे बेचारे, जीव सभी।पूरी जो ना हो राखे ना, चाह कभी।।जो भी दे दो वो ही खा के, मस्त रहे।इन्सां तेरे दुःखों को क्यों, मूक...
हुई नोट बन्दी ठगा सा जमाना।किसी को रुलाना किसी को हँसाना।।कहीं आँसुओं की झड़ी सी लगी है।कहीं पे खुशी की दिवाली जगी है।।इकट्ठा जिन्होंने किया वित्त काला।उन्हीं का पिटा आज देखो दिवाला।।बसी थी जहाँ अल्प ईमानदारी।खरे लोग देखो सभी हैं सुखारी।।कहीं नोट की लोग होली जलाते।क...
दो भक्ति मुझे कृष्णा।मेटो जग की तृष्णा।।मैं पातक संसारी।तू पापन का हारी।।मैं घोर अनाचारी।तू दिव्य मनोहारी।।चाहूँ करुणा तेरी।दे दो न करो देरी।।वृंदावन में जाऊँ।शोभा ब्रज की गाऊँ।।मैं वेणु सुनूँ प्यारी।छानूँ धरती न्यारी।।गोपाल चमत्कारी।तेरी महिमा भारी।।छायी अँधियारी...
सुखद बसंत पंचमी।पतझड़ शुष्कता थमी।।सब फिर से हरा-भरा।महक उठी वसुंधरा।।विटप नवीन पर्ण में।कुसुम अनेक वर्ण में।।खिल कर झूमने लगे।यह लख भाग्य ही जगे।।कुहुक सुनाय कोयली।गरजत मन्द बादली।।भ्रमर-गुँजार छा रही।सरगम धार सी बही।।शुभ ऋतुराज आ गया।अनुपम चाव छा गया।।कलरव दिग्दिग...
सत्यसनातन, ये है ज्ञाना।भक्ति बिना नहिं, हो कल्याना।।राम-कृपा जब, होती प्राणी।हो तब जागृत, अन्तर्वाणी।।चक्षु खुले मन, हो आचारी।दूर हटे तब, माया सारी।।प्रीत बढ़े जब, सद्धर्मों में।जी रहता नित, सत्कर्मों में।राम समान न, कोई देवा।इष्ट धरो अरु, चाखो मेवा।।नित्य जपे नर,...
सुन ओ भारतवासी अबोध,कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?आये दिन करता हड़ताल,ट्रेनें फूँके हो विकराल,धरने दे कर रोके चाल,सड़कों पर लाता भूचाल,करे देश को तू बदहाल,और बजाता झूठे गाल,क्या यही तेरा है आत्म-बोध,कहाँ गया सच्चा प्रतिरोध?क्या व्यर्थ व्यवस्था के ये तंत्र,चाहे रोये लोकतंत्...
आज बसंत की छायी लाली,बागों में छायी खुशियाली,आज बसंत की छायी लाली॥वृक्ष वृक्ष में आज एक नूतन है आभा आयी।बीत गयी पतझड़ की उनकी वह दुखभरी रुलायी।आज खुशी में झूम झूम मुसकाती डाली डाली।आज बसंत की छायी लाली॥1॥इस बसंतने किये प्रदान हैं उनको नूतन पल्लव।चहल पहल में बदल गया...
बहर:- 2122  -  2122  -  212छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ,रो रही है आज मानवता यहाँ।देश सारा खो गया है भीड़ में,रो रहे सारे ही मानव पीड़ में।द्रौपदी सी लाज रखलो तुम जहाँ,छुप गये हो श्याम सुंदर तुम कहाँ।स्वार्थ में अंधे यहाँ के लोग हैं,भोग वश कैसे...
(धुन- हम तो ठहरे परदेशी)(212 1222)×2आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।एक बार डूबें तो, डूबते ही जाते हैं।।जो न इसमें डूबे हैं, पूछते हैं वो हम से;आँख का नशा क्या है, हम उन्हें बताते हैं।आँख के नशे में जब, वो हमें डुबाते हैं।।झील सी ये गहरी हैं, मय से ये लबालब भ...
सारी पहने लहरिया, घर से निकली नार।रीत रिवाजों में फँसी, लम्बा घूँघट डार।लम्बा घूँघट डार, फोन यह कर में धारे।शामत उसकी आय, हाथ इज्जत पर डारे।अबला इसे न जान, लाज की खुद रखवारी।कर देती झट दूर, अकड़ चप्पल से सारी।।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया19-5-17