ब्लॉगसेतु

काम क्रोध के भरे पिटारे, कलियुग के ये बाबा,बेच गये खा मन्दिर मस्ज़िद, काशी हो या काबा,चकाचौंध इनकी झूठी है, बचके रहना इनसे,भोले भक्तों को ठगने का, सारा शोर शराबा।सार छंद आधारित*********लिप्त रहो जग के कर्मों में, ये कैसा सन्यास बता,भगवा धारण करने से नहिं, आत्म-शुद्ध...
सितम यूँ खूब ढ़ा लो।या फिर तुम मार डालो।मगर मुझ से जरा तुम।मुहब्बत तो बढ़ालो।।***दुआ रब की तो पा लो।बसर अजमेर चालो।तमन्ना औलिया की।जरा मन में तो पालो।।***अरी ओ सुन जमालो,मुझे तुम आजमा लो,ठिकाना अब तेरा तू,मेरे दिल पे जमा लो।***ये ऊँचे ख्वाब ना लो।जमीं पे पाँ टिका लो।...
काफ़िया = ई; रदीफ़ = भूखदुनिया में सबसे बड़ी, है रोटी की भूख।पाप कराये घोरतम, जब बिलखाती भूख।।आँतड़ियाँ जब ऐंठती, जलने लगता पेट।नहीं चैन मन को पड़े, समझो जकड़ी भूख।।मान, प्रतिष्ठा, ओहदा, कभी न दें सन्तोष।ज्यों ज्यों इनकी वृद्धि हो, त्यों त्यों बढ़ती भूख।।कमला तो चंचल बड़ी,...
महिमा कुर्सी की बड़ी, इससे बचा न कोय।राजा चाहे रंक हो, कोउ न चाहे खोय।कोउ न चाहे खोय, वृद्ध या फिर हो बालक।समझे इस पर बैठ, सभी का खुद को पालक।कहे 'बासु' कविराय, बड़ी इसकी है गरिमा।उन्नति की सौपान, करे मण्डित ये महिमा।।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया22-12-2018
8,8,8,6मिलते विषम दोय, सम-कल तब होय,सम ही कवित्त को तो, देत बहाव है।आदि न जगन रखें, लय लगातार लखें,अंत्य अनुप्रास से ही, या का लुभाव है।शब्द रखें भाव भरे, लय ऐसी मन हरे,भरें अलंकार जा का, खूब प्रभाव है।गाके देखें बार बार, अटकें न मझधार,रचिए कवित्त जा से, भाव रिसाव...
विपदहै विकटहाथ पर हाथरख, देखें बाट;कोई बचाएगा,या फिर भाग जाएंगे।**बुरीनहीं शांति,न सहन शक्ति,हो अत्याचार,,पलायन अंगीकार!या फिर शांति रख सहना?**जुल्म,,,है खौफ,सब चुपचाप,अपनों का न साथ,शासन को क्या पड़ी?वोटों की पके खिचड़ी।**(मेरठ में हिंदू पलायन पर)बासुदेव अग्रवाल 'नम...
मेरे द्वारा प्रतिपादित यह "छकलियाँ" हिंदी साहित्य में काव्य की एक नवीन विधा है। यह हाइकु, वर्ण पिरामिड जैसी लघु संरचना है। जापानी में हाइकु, ताँका, सेदोका इत्यादि और अंग्रेजी में हाइकु, ईथरी आदि लघु कविताएं सिलेबल की गिनती पर आधरित हैं और बहुत प्रचलित हैं। ये कविता...
गजानन विघ्न करो सब दूर।करो तुम आस सदा मम पूर।।नवा कर माथ करूँ नित जाप।कृपा कर के हर लो भव-ताप।।प्रियंकर रूप सजे गज-भाल।छटा अति मोहक तुण्ड विशाल।।गले उपवीत रखो नित धार।भुजा अति पावन सोहत चार।।धरें कर में शुभ अंकुश, पाश।करें उनसे रिपु, दैत्य विनाश।।बिराजत हैं कमलासन...
सेना अरि की हमला करती।हो व्याकुल माँ सिसकी भरती।।छाते जब बादल संकट के।आगे सब आवत जीवट के।।माँ को निज शीश नवा कर के।माथे रज भारत की धर के।।टीका तब मस्तक पे सजता।डंका रिपु मारण का बजता।।सेना करती जब कूच यहाँ।छाती अरि की धड़कात वहाँ।।डोले तब दिग्गज और धरा।काँपे नभ ज्यो...
सुन मन-मधुकर।मत हिय मद भर।।करत कलुष डर।हरि गुण उर धर।।सरस अमिय सम।प्रभु गुण हरदम।।मन हरि मँह रम।हर सब भव तम।।मन बहुत विकल।हलचल प्रतिपल।।पड़त न कछु कल।हरि-दरशन हल।।प्रभु-शरण लखत।यह सर अब नत।।तव चरण पड़त।रख नटवर पत।।=============लक्षण छंद:-"ननलल" लघु सब।'मलयज' रच तब।&n...