ब्लॉगसेतु

मन विशाल है एक सरोवर,स्मृतियों के कंकर,हल्की सी बस लहर उठे।***बसी हुई है मन में प्रीत,गीत सजन के गूँजे,हृदय लिया, अनजाना जीत***हृदय पटल पर चित्र उकेरे,जिसने ज्योत जगायी,मनमंदिर में मेरे।***बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया17-05-20
लावणी छंद आधारितभारत के उज्ज्वल मस्तक पर, मुकुट बना जो है शोभित,जिसके पुण्य तेज से पूरा, भू मण्डल है आलोकित,महादेव के पुण्य धाम को, आभा से वह सजा रहा,आज हिमालय भारत भू की, यश-गाथा को सुना रहा।तूफानों को अंक लगा कर, तड़ित उपल की वृष्टि सहे,शीत ताप छाती पर झेले, बन मश...
कई कौंधते प्रश्न अचानक, चर्चा से विषकन्या की।जहर उगलती नागिन बनती, कैसे मूरत ममता की।।गहराई से इस पर सोचें, समाधान हम सब पाते।कलुषित इतिहासों के पन्ने, स्वयंमेव ही खुल जाते।।पहले के राजा इस विध से, नाश शत्रु का करवाते।नारी को हथियार बना कर, शत्रु देश में भिजवाते।।ज...
आजादी का पर्व सुहाना, पन्द्रह आज अगस्त।बस्ती के निर्धन कुछ बच्चे, देखो कैसे मस्त।।टोली इनकी निकल पड़ी है, मन में लिये उमंग।कुछ करने की धुन इनमें है, लगते पूर्ण मलंग।।चौराहे पर सब आ धमके, घेरा लिया बनाय।भारत की जय कार करे तब, वे नभ को गूँजाय।।बना तिरंगा कागज का ये, ल...
जय भारत जय पावनि गंगे, जय गिरिराज हिमालय;सकल विश्व के नभ में गूँजे, तेरी पावन जय जय।तूने अपनी ज्ञान रश्मि से, जग का तिमिर हटाया;अपनी धर्म भेरी के स्वर से, जन मानस गूँजाया।।उत्तर में नगराज हिमालय, तेरा मुकुट सजाए;दक्षिण में पावन रत्नाकर , तेरे चरण धुलाए।खेतों की हरि...
बह्र:- 221 1221 1221 122मूली में है झन्नाट जो, आलू में नहीं है,इमली सी खटाई भी तो निंबू में नहीं है।किशमिश में लचक सी जो है काजू में नहीं है,जो लुत्फ़ है भींडी में वो कद्दू में नहीं है।बेडोल दिखे, गोल सदा, बाँकी की महिमा,जो नाज़ है बरफी में वो लड्डू में नहीं है।जितनी...
बह्र:- 22  22  22  22  22  2साथ सजन तो चाँद सुहाना लगता है,दूर पिया तो फिर वो जलता लगता है।मन में जब ख़ुशहाली रहती है छायी,हर मौसम ही तब मस्ताना लगता है।बच्चों की किलकारी घर में जब गूँजे,गुलशन सा घर का हर कोना लगता है।प्रीतम प्यारा जब से ही...
बह्र :- 2212   2212   2212   2212यादों के जो अनमोल क्षण मन में बसा हरदम रखें,राहत मिले जिस याद से उर से लगा हरदम रखें।जब प्रीत की हम डोर में इक साथ जीवन में बँधे,हम उन सुनहरे ख्वाबों को दिल में जगा हरदम रखें।छाती हमारी शान से चौड़ी हुई...
गिरि से निर्झर पिघला,सर्प रहे उड़ इठला,गरजें मेघ लरज थर थर।***मेघ घिरे नभ में हर ओर,हरित धरा, नाचे मोर,सावन शुष्क! दूर चितचोर।***भोर पहन मौक्तिक माला,दुर्वा पर बैठी,हाथ साफ रवि कर डाला।***बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया23-06-20
ओ मेरे सब्र तू मुझ से न ख़फ़ा हो जाना,छोड़ दे साथ जमाना तो मेरा हो जाना,दर्द-ओ-ग़म भूल रखूं तुझको बसाये दिल में,फ़ख्र जिस पे मैं करूं वो तू अना हो जाना।(2122 1122 1122 22)01-08-2020*******चाहे दुश्मन रहा जमाना, रीत सनातन कभी न छोड़ी,जननी जन्म भूमि से हमने, अपनी प्रीत सदा...