ब्लॉगसेतु

ढ़ोते जो हम बोझ चार पे, तुम वो दो पर ढ़ोते हो,तरह हमारी तुम भी खाते, पीते, जगते, सोते हो,पर उसने वो समझ तुम्हें दी, जिससे तुम इंसान बने,वरना हम तुम में क्या अंतर, जो गरूर में खोते हो।(लावणी छंद आधारित)*********बल बुद्धि शौर्य के स्वामी तुम, मानव जग में कहलाते हो,तुम...
मधुवन महकत, शुक पिक चहकत,जन-मन हरषत,  मधु रस बरसे।कलि कलि सुरभित, गलि गलि मुखरित,उपवन पुलकित, कण-कण सरसे।तृषित हृदय यह, प्रभु-छवि बिन दह,दरश-तड़प सह, निशि दिन तरसे।यमुन-पुलिन पर, चित रख नटवर,'नमन' नवत-सर, ब्रज-रज परसे।।*****जनहरण विधान:- (कुल वर्ण संख्या = 31 ।...
कर्मठता नहिँ त्यागिए, करें सदा कुछ काम।कर्मवीर नर पे टिका, देश धरा का नाम।देश धरा का नाम, करें वो कुल को रौशन।कर्म कभी नहिँ त्याग, यही गीता का दर्शन।कहे 'बासु' समझाय, करो मत कभी न शठता।सौ झंझट भी आय, नहीं छोड़ो कर्मठता।।बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया21-12-16
काफ़िया- आ, रदीफ़-सम्मानदेश वासियों नित रखो, निज भाषा सम्मान।स्वयं मान दोगे तभी, जग देगा सम्मान।।सब से हमको यश मिले, मन में तो यह चाह।पर सीखा नहिं और को, कुछ देना सम्मान।।गुणवत्ता अरु पात्र का, जरा न सोच विचार।खुले आम बाज़ार में, अब बिकता सम्मान।।देख देख फटता जिया, का...
बम बम के हम उद्घोषों से, धरती गगन नाद से भरते।बोल 'बोल बम' के पावन सुर, आह्वाहन भोले का करते।।पर तुम हृदयहीन बन कर के, मानवता को रोज लजाते।बम के घृणित धमाके कर के, लोगों का नित रक्त बहाते।।हर हर के हम नारे गूँजा, विश्व शांति को प्रश्रय देते।साथ चलें हम मानवता के, द...
बिजलियों की गूंज, मेघों की घटा।हो रही बरसात, सावन की छटा।।ढोलकी हर ओर, रिमझिम की बजी।हो हरित ये भूमि, नव वधु सी सजी।।नृत्य दिखला मोर, मन को मोहते।जुगनुओं के झूंड, जगमग सोहते।।रख पपीहे आस, नभ को तक रहे।काम-दग्धा नार, लख इसको दहे।।========विधान:-पीयूषवर्ष छंद।19 मात्...
शैतानी जो थी धारा।जैसे कोई थी कारा।।दाढों में घाटी सारी।भारी दुःखों की मारी।।लूटों का बाजे डंका।लोगों में थी आशंका।।हत्याएँ मारामारी।सांसों पे वे थी भारी।।भोले बाबा की मर्जी।वैष्णोदेवी माँ गर्जी।।घाटी की होनी जागी।आतंकी धारा भागी।।कश्मीरी की आज़ादी।उन्मादी की बर्बाद...
बह्र:- 212*4जो गिरे हैं उन्हें हम उठाते रहे,दर्द में उनके आँसू बहाते रहे।दीप हम आँधियों में जलाते रहे।लोग कुछ जो इन्हें भी बुझाते रहे।जो गरीबी की सह मार बेज़ार हैं,आस जीने की उन में जगाते रहे।राह मज़लूम की तीरगी से घिरी,रस्ता जुगनू बने हम दिखाते रहे।खुद परस्ती ओ नफ़रत...
बह्र:- 1222 1222 1222 1222रहे जो गर्दिशों में ऐसे अनजानों पे क्या गुज़री,किसे मालूम उनके दफ़्न अरमानों पे क्या गुज़री।कमर झुकती गयी पर बोझ जो फिर भी रहे थामे,न जाने आज की औलाद उन शानों पे क्या गुज़री।अगर इस देश में महफ़ूज़ हम हैं तो ज़रा सोचें।वतन की सरहदों के उन निगहबानो...
बह्र:- 2222 2222 2222 222गदहे को भी बाप बनाऊँ कैसी ये मज़बूरी है,कुत्ते सा बन पूँछ हिलाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।एक गाम जो रखें न सीधा चलना मुझे सिखायें वे,उनकी सुन सुन कदम बढ़ाऊँ कैसी ये मज़बूरी है।झूठ कपट की नई बस्तियाँ चमक दमक से भरी हुईं,अपना घर में वहाँ बसाऊँ कैसी ये...