ब्लॉगसेतु

(1)हैरुतपावस,वर्षा बूंदेंकरे फुहार,,मिटा हाहाकार,भरा सुख-भंडार।***(2)क्योंहोती विनष्ट,आँखें मूंदजल की बूंद,ये न है स्वीकार,हो ठोस प्रतिकार।***बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया09-07-19
कोरोनासुरविपदा बन करटूटा भू पर।**यह कोरोनासकल जगत काअक्ष भिगोना।**कोरोना परमुख को ढक करआओ बाहर।**कोरोना यहजगत रहा सहकैदी सा रह।**कोरोना अबनिगल रहा सबजायेगा कब?**बासुदेव अग्रवाल नमनतिनसुकिया14-08-20
सोया पड़ा हुआ शासन,कठिन बड़ा अब पेट भरण,शरण कहाँ? केवल शोषण,***ले रहा जनतंत्र सिसकी,स्वार्थ की चक्की चले,पाट में जनता विवस सी।***चुस्त प्रशासन भी बेकार,जनता सुस्त निकम्मी,लोकतंत्र की लाचारी।***बासुदेव अग्रवाल 'नमन'तिनसुकिया2-05-20
2212*4 (हरिगीतिका छंद आधारित)(पदांत 'को जाने नहीं', समांत 'आन')प्रतिरूप बालक प्यार का भगवान का प्रतिबिम्ब है,कितना मनोहर रूप पर अभिमान को जाने नहीं।।पहना हुआ कुछ या नहीं लेटा किसी भी हाल में,अवधूत सा निर्लिप्त जग के भान को जाने नहीं।।चुप था अभी खोया हुआ दूजे ही पल...
परदेशाँ जाय बैठ्या बालमजी म्हारी हेली!ओळ्यूँ आवै सारी रात।हिया मँ उमड़ै काली कलायण म्हारी हेली!बरसै नैणां स्यूँ बरसात।।मनड़ा रो मोर करै पिऊ पिऊ म्हारी हेली!पिया मेघा ने दे पुकार।सूखी पड्योरी बेल सींचो ये म्हारी हेली!कर नेहाँ रे मेह री फुहार।।आखा तीजड़ गई सावण भी सूखो...
वो मनभावन प्रीत लगा।छोड़ चला मन भाव जगा।।आवन की सजना धुन में।धीर रखी अबलौं मन में।।खावन दौड़त रात महा।आग जले नहिं जाय सहा।।पावन सावन बीत रहा।अंतस हे सखि जाय दहा।।मोर चकोर मचावत है।शोर अकारण खावत है।।बाग-छटा नहिं भावत है।जी अब और जलावत है।।ये बरखा भड़कावत है।जो विरहाग्...
नर्तत त्रिपुरारि नाथ, रौद्र रूप धारे।डगमग कैलाश आज, काँप रहे सारे।।बाघम्बर को लपेट, प्रलय-नेत्र खोले।डमरू का कर निनाद, शिव शंकर डोले।।लपटों सी लपक रहीं, ज्वाल सम जटाएँ।वक्र व्याल कंठ हार, जीभ लपलपाएँ।।ठाडे हैं हाथ जोड़, कार्तिकेय नंदी।काँपे गौरा गणेश, गण सब ज्यों बं...
आडंबर में नित्य घिरा।नारी का सम्मान गिरा।।सत्ता के बुलडोजर से।उन्मादी के लश्कर से।।रही सदा निज में घुटती।युग युग से आयी लुटती।।सत्ता के हाथों नारी।झूल रही बन बेचारी।।मौन भीष्म भी रखै जहाँ।अंधा है धृतराष्ट्र वहाँ।।उच्छृंखल हो राज-पुरुष।करते सारे पाप कलुष।।अधिकारी सा...
 बह्र:- 12122*2परंपराएं निभा रहे हैं।खुशी से जीवन बिता रहे हैं।रिवाज, उत्सव हमारे न्यारे,उमंग से वे मना रहे हैं।अनेक रंगों के पुष्प से खिल,वतन का उपवन सजा रहे हैं।हृदय में सौहार्द्र रख के सबसे,हो मग्न कोयल से गा रहे हैं।बताते औकात उन को अपनी,हमें जो आँखें दिखा...
बह्र:- 2122*2रोग या कोई बला है,जिस में नर से नर जुदा है।हाय कोरोना की ऐसी,बंद नर घर में पड़ा है।दाव पर नारी की लज्जा,तंत्र का चौसर बिछा है।हो नशे में चूर अभिनय,रंग नव दिखला रहा है।खुद ही अपनी खोदने में,आदमी जड़ को लगा है।आज मतलब के हैं रिश्ते,कौन किसका अब सगा है।लेखन...