ब्लॉगसेतु

यह आग की बात है तूने यह बात सुनाई है यह ज़िंदगी की वो ही सिगरेट है जो तूने कभी सुलगाई थी चिंगारी तूने दे थी यह दिल सदा जलता रहा वक़्त कलम पकड़ कर कोई हिसाब लिखता रहा चौदह मिनिट हुए हैं इसका ख़ाता देखो चौदह साल ही हैं इस कलम से पूछो मेरे इस जिस्म में तेरा साँस चलता...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
रूप की जब की बड़ाई, रात के बारह बजे शेरनी घेरे में आई, रात के बारह बजे कल जिसे दी थी विदाई, रात के बारह बजे वो बला फिर लौट आई, रात के बारह बजे हम तो अपने घर में बैठे तक रहे थे चांद को और चांदनी क्यों छत पे आई, रात के बारह बजेदेखने को दिन में ही मनहूस चेहरे कम...
मुझको बहुत से लोग जानते हैं कि मैं वाचाल हूँ लेकिन मुझको जब काम पड़ता है तब मैं देखता हूँ कि मेरी वाणी रुक जाती है। यही दशा मेरी इस समय हो रही है। प्रथम तो जो अनुग्रह और आदर आप लोगों ने मेरा किया है उसके भार से ही मैं दब रहा हूँ, इसके उपरान्‍त मेरे प्रिय मित्रों औ...
 पोस्ट लेवल : आलेख मदनमोहन मालवीय
आज हमने एक दुनिया बेची और एक दीन ख़रीद लिया हमने कुफ़्र की बात की सपनों का एक थान बुना था एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया और उम्र की चोली सी ली आज हमने आसमान के घड़े से बादल का एक ढकना उतारा और एक घूँट चाँदनी पी ली यह जो एक घड़ी हमने मौत से उधार ली है गीतों से इसका दाम चुका...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
हमारे बाप-दादे भी कैसे घामड़ थे जो मक्खन खाते थे। बताइए, मक्खन भी कोई खाने की चीज है! खट्टी-खट्टी डकारें आती हैं। पेट तूंबे की तरह फूल जाता है और गुड़गुड़ाने लगता है - कि जैसे अली अकबर सरोद बजा रहे हों या कोई भूत पेट के भीतर बैठा हुक्का पी रहा हो। और वायु तो इतनी बनत...
 पोस्ट लेवल : आलेख अमृत राय
लोकतंत्र के लुच्चों, दगाबाज टुच्चों! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और हरिजन, जब हम हार गए तो काहे का इलेक्शन, जिस देश की जनता हो तुम जैसी वहां काहे की डेमोक्रेसी? भितरघातियो, जयचंद के नातियों! तुमने अंगूरी पीकर अंगूठा दिखाया है, आज मुझको नहीं मिनी महात्मा गांधी को हराय...
 पोस्ट लेवल : माणिक वर्मा कविता
शीर्षक में यह स्वीकार कर लिया गया है कि लेख का विषय 'साहित्य-बोध' है; पर वास्तव में इस अर्थ में इसका प्रयोग चिंत्य है। यह मान भी लें कि लोक-व्यवहार बहुत से शब्दों को ऐसा विशेष अर्थ दे देता है जो यों उनसे सिद्ध न होता, तो भी अभी तक ऐसा जान पड़ता है कि समकालीन संदर्...
तुम मिले तो कई जन्म मेरी नब्ज़ में धड़के तो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पिया तब मस्तक में कई काल पलट गए! एक गुफा हुआ करती थी जहाँ मैं थी और एक योगी योगी ने जब बाजुओं में लेकर मेरी साँसों को छुआ तब अल्लाह क़सम! यही महक थी जो उसके होठों से आई थी-- यह क...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
जब मैं पेशावर से चली तो मैंने छका छक इत्मिनान का सांस लिया। मेरे डिब्बों में ज़्यादा-तर हिंदू लोग बैठे हुए थे। ये लोग पेशावर से हुई मरदान से, कोहाट से, चारसदा से, ख़ैबर से, लंडी कोतल से, बन्नूँ नौशहरा से, मांसहरा से आए थे और पाकिस्तान में जानो माल को महफ़ूज़ न पाकर हि...
 पोस्ट लेवल : कहानी कृष्ण चंदर
कुछ दिन से नवाब साहब के मुसाहिबों को कुछ हाथ मारने का नया अवसर नही मिला था। नवाब साहब थे पुराने ढंग के रईस। राज्‍य तो बाप-दादे खो चुके थे, अच्‍छा वसीका मिलता था। उनकी ‘इशरत मंजिल’ कोठी अब भी किसी साधारण राजमहल से कम न थी। नदी-किनारे वह विशाल अट्टालिका चाँदनी रात मे...