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है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए। रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए। अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए। फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया जीस्...
 पोस्ट लेवल : कविता गोपालदास 'नीरज'
चाँद है ज़ेरे क़दम सूरज खिलौना हो गया हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया। शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले कोठियों की लॉन का मंज़र सलौना हो गया। ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया। यूँ तो आदम के बदन पर भी था...
 पोस्ट लेवल : अदम गोंडवी कविता गज़ल
सहमा सहमा डरा सा रहता हैजाने क्यूँ जी भरा सा रहता है।काई सी जम गई है आँखों परसारा मंज़र हरा सा रहता है।एक पल देख लूँ तो उठता हूँजल गया घर ज़रा सा रहता है।सर में जुम्बिश ख़याल की भी नहींज़ानुओं पर धरा सा रहता है। ------------------------- गुलज़ार 
 पोस्ट लेवल : कविता गज़ल गुलज़ार
जो तुम आ जाते एक बार कितनी करूणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार तार अनुराग भरा उन्माद राग आँसू लेते वे पथ पखार जो तुम आ जाते एक बार हँस उठते पल में आर्द्र नयन धुल जाता होठों से विषाद छा जाता जीवन में बसंत लुट जाता चिर संचित विराग आँखें देती...
 पोस्ट लेवल : कविता महादेवी वर्मा
ईशर सिंह जूंही होटल के कमरे में दाख़िल हुआ। कुलवंत कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज़ तेज़ आँखों से उसकी तरफ़ घूर के देखा और दरवाज़े की चटख़्नी बंद कर दी। रात के बारह बज चुके थे, शहर का मुज़ाफ़ात एक अजीब पुर-असरार ख़ामोशी में ग़र्क़ था। कुलवंत कौर पलंग पर आलती पालती मार कर बै...
 पोस्ट लेवल : कहानी सआदत हसन मंटो
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी… और गलियाँ इस तरह जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता कोई उधर हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ दीवारें-किचकिचाती सी और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी जो उसे देख कर यह और गरमाती और...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है जो लोह-ए-अज़ल में लिखा हैजब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रुई की तरह उड़ जाएँगे हम महकूमों के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हकम के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से सब...
आप की याद आती रही रात भर चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर रात भर दर्द की शम्अ जलती रही ग़म की लौ थरथराती रही रात भर बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा याद बन बन के आती रही रात भर याद के चाँद दिल में उतरते रहे चाँदनी जगमगाती रही रात भर कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा कोई आ...
मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……फिर समुन्द्र को खुदा जाने क्या ख्याल आया उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी मेरे हाथों में थमाई और हंस कर कुछ दूर हो गया हैरान थी…. पर उसका चमत्कार ले लिया पता था कि इस प्रकार की घटना कभी सदियों में...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
हरा भरा यह देश तुम्हारी ऐसी तैसीफिर भी इतने क्लेश तुम्हारी ऐसी तैसीबंदर तक हैरान तुम्हारी शक्ल देखकरकिसके हो अवशेष तुम्हारी ऐसी तैसीआजादी लुट गई भांवरों के पड़ते हीऐसे पुजे गणेश तुम्हारी ऐसी तैसीहमें बुढ़ापा मिला जवानी में और तुमकोजब देखो तब फ्रेश तुम्हारी ऐसी तैसी...