ब्लॉगसेतु

रोज़ जब धूप पहाड़ों से उतरने लगतीकोई घटता हुआ बढ़ता हुआ बेकल सायाएक दीवार से कहता कि मेरे साथ चलो।और ज़ंजीरे-रफ़ाक़त से गुरेज़ाँ दीवारअपने पिंदार के नश्शे में सदा ऐस्तादाख़्वाहिशे-हमदमे-देरीना प’ हँस देती थी।कौन दीवार किसी साए के हमराह चलीकौन दीवार हमेशा मगर ऐस्त्त...
 पोस्ट लेवल : कविता अहमद फ़राज़
माँ है रेशम के कारख़ाने मेंबाप मसरूफ़ सूती मिल में हैकोख से माँ की जब से निकला हैबच्चा खोली के काले दिल में है।जब यहाँ से निकल के जाएगाकारख़ानों के काम आएगाअपने मजबूर पेट की ख़ातिरभूक सरमाये की बढ़ाएगा।हाथ सोने के फूल उगलेंगेजिस्म चान्दी का धन लुटाएगाखिड़कियाँ होंग...
आज सूरज ने कुछ घबरा कररोशनी की एक खिड़की खोलीबादल की एक खिड़की बंद कीऔर अंधेरे की सीढियां उतर गया…आसमान की भवों परजाने क्यों पसीना आ गयासितारों के बटन खोल करउसने चांद का कुर्ता उतार दिया…मैं दिल के एक कोने में बैठी हूंतुम्हारी याद इस तरह आयीजैसे गीली लकड़ी में सेगह...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
टीवी खोला ही था कि धमाका हुआ और धमाका देखकर मेरे बालमन का मयूर नाच उठा। बालमन का मयूर था तो नौसिखिया नर्तक होना तो लाजमी ही था। परन्तु नौसिखिए नर्तक के साथ सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि उसे हर काम में ‘साथी हाथ बढ़ाना’ वाले भाव में एक साथी की आवश्यकता महसूस होती है।...
मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?&...
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप कोमैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपकोजिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब करमर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब करहै सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरीआ रही है सामने से हरखुआ की छोकरीचल रही है छंद के आयाम को देती दिशामैं इसे कहता हूं सरज...
 पोस्ट लेवल : अदम गोंडवी कविता
माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविताअमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता हैमाँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती हैमैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ यह किस तरह होता होगा घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती हैऔर मैं बैठे-बैठे दूसरी...
चौक से चलकर, मंडी से, बाज़ार से होकरलाल गली से गुज़री है कागज़ की कश्तीबारिश के लावारिस पानी पर बैठी बेचारी कश्तीशहर की आवारा गलियों से सहमी-सहमी पूछ रही हैं हर कश्ती का साहिल होता है तोमेरा भी क्या साहिल होगा?एक मासूम से बच्चे नेबेमानी को मानी देकररद्दी के का...
 पोस्ट लेवल : कविता गुलज़ार
पिछले कुछ समय से हिन्दी के उपभाषाएँ एवं बोलोयाँ कही जाने वाली भोजपुरी, राजस्थानी व अन्य लोकभाषाएँ अपने स्वतंत्र अस्तित्व व अधिकारों के लिए कागज से लेकर सड़क और सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष कर रही हैं। जिसका असर ये हुआ है कि हिन्दी के समर्थन में भी ध्रूवीकरण प्रारम्भ ह...
 पोस्ट लेवल : आलेख राजीव उपाध्याय
सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को।पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकरअब हँसी की लहरें काँपी दीवारों परखिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को।पर कोई आया गया न कोई बोलाखुद मैंने ही घर का दरवाजा खोलाआदतवश आवाजें दीं सूनेपन को।फिर घर की खामोशी भर आई मन मेंचूड़ियाँ खनकती नहीं कह...
 पोस्ट लेवल : कविता दुष्यंत कुमार