ब्लॉगसेतु

क्योंकिमैं रुक ना सकीमृत्यु के लिएदयालुता से मगरइन्तजार उसने मेरा कियाऔर रूकी जब तो हम और अमरत्वबस रह गए।धीरे-धीरे बढ़ चले सफर पर हम जल्दबाजी नहीं उसे। सब कुछ छोड़ दिया मैंने अपनी मेहनत और आराम भी। शिष्टता उसकी ऐसी थी!हम स्कूल से होकर गु...
उलझनें हर बार छटपटाहट में बदल जाती हैं और मन जैसे किसी कालकोठरी में हो बंद मुक्त होने का स्वप्न लेकर देता है दस्तक तेरे महल के दरवाजे पर लिखा है जहाँ शब्दों में बडे ‘कि अंदर आना मना है।'प्रतिबंध ही तो आसमान के दरवाजे को ढकेलकर उस पार क...
कँधे झुक जाते है जब बोझ से इस लम्बे सफ़र केहाँफ जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज चढानेसाँसे रह जाती है जब सीने में एक गुच्छा हो करऔर लगता है दम टूट जायेगा यहीं पर।एक नन्ही सी नज़्म मेरे सामने आ करमुझ से कहती है मेरा हाथ पकड़ करमेरे शायर ला, मेरे कन्धों पे रख देमें तेर...
 पोस्ट लेवल : कविता गुलजार
रोज़ जब धूप पहाड़ों से उतरने लगतीकोई घटता हुआ बढ़ता हुआ बेकल सायाएक दीवार से कहता कि मेरे साथ चलो।और ज़ंजीरे-रफ़ाक़त से गुरेज़ाँ दीवारअपने पिंदार के नश्शे में सदा ऐस्तादाख़्वाहिशे-हमदमे-देरीना प’ हँस देती थी।कौन दीवार किसी साए के हमराह चलीकौन दीवार हमेशा मगर ऐस्त्त...
 पोस्ट लेवल : कविता अहमद फ़राज़
माँ है रेशम के कारख़ाने मेंबाप मसरूफ़ सूती मिल में हैकोख से माँ की जब से निकला हैबच्चा खोली के काले दिल में है।जब यहाँ से निकल के जाएगाकारख़ानों के काम आएगाअपने मजबूर पेट की ख़ातिरभूक सरमाये की बढ़ाएगा।हाथ सोने के फूल उगलेंगेजिस्म चान्दी का धन लुटाएगाखिड़कियाँ होंग...
आज सूरज ने कुछ घबरा कररोशनी की एक खिड़की खोलीबादल की एक खिड़की बंद कीऔर अंधेरे की सीढियां उतर गया…आसमान की भवों परजाने क्यों पसीना आ गयासितारों के बटन खोल करउसने चांद का कुर्ता उतार दिया…मैं दिल के एक कोने में बैठी हूंतुम्हारी याद इस तरह आयीजैसे गीली लकड़ी में सेगह...
 पोस्ट लेवल : कविता अमृता प्रीतम
टीवी खोला ही था कि धमाका हुआ और धमाका देखकर मेरे बालमन का मयूर नाच उठा। बालमन का मयूर था तो नौसिखिया नर्तक होना तो लाजमी ही था। परन्तु नौसिखिए नर्तक के साथ सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि उसे हर काम में ‘साथी हाथ बढ़ाना’ वाले भाव में एक साथी की आवश्यकता महसूस होती है।...
मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?&...
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप कोमैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपकोजिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब करमर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब करहै सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरीआ रही है सामने से हरखुआ की छोकरीचल रही है छंद के आयाम को देती दिशामैं इसे कहता हूं सरज...
 पोस्ट लेवल : अदम गोंडवी कविता
माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविताअमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता हैमाँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती हैमैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ यह किस तरह होता होगा घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती हैऔर मैं बैठे-बैठे दूसरी...