ब्लॉगसेतु

चाँद से मेरी कभी अब गुफ़्तगू होती नहीं।रोज़ आता है मगर मैं रूबरू होती नहीं॥कभी पूरा, तो कभी आधा आधा मिलता हैसहन मुझसे ये अधूरी आरज़ू होती नहीं॥तेरे कहने से दफ़्न कर देती जो यादें तेरीरौशनी ये आज मेरे हर एक सू होती नहीं॥जफा के ज़िक्र पे फिसला लबों से तेरा नामफैली ये...
 पोस्ट लेवल : सुदर्शन शर्मा कविता
स्त्री कितनी आज़ादऔरकहाँ सेमन से,देह सेसोच से?पुरुषों की फिसलती निगाहेंनापती हैं जब उसकेजिस्म के भूगोल कोनहीं उठता कोई भूचालन सुनामी आती है!पर जब वो सचेत दिखती हैअपने संरचनाओं के प्रति,पा जाती है कई ख़िताब वोकुलटा, बदचलन, और भी क्या -क्या!आज भी तू एक वस्तु हैजिसे तुल...
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगेहर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे।इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करनाघर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे।शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्तेबहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे।हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैंछत से दीवारें जुदा ह...
ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नहीं।इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं| ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।सच घटे या बड़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।ज़िन्द...
कुछ चेहरेबस चेहरे नहीं होतेसूर्ख शर्तें होती हैं हमारे होने की।कुछ बातेंबस बातें नहीं होतींवजह होती हैं हमारे होने की।और बेवजह भी बहुत कुछ होता हैजिनसे जुड़ी होती हैंहमारी साँसें होने की।तो क्या कर इन्हें मैं याद करूँकि जीते रहें ये यूँ करकि रहे खबर मुझे मेरे होने क...
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होतीपुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होतीग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होतीबैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो हैसहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो हैसबसे ख़तरनाक नहीं होताकपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो हैजुगनुओं...
हमारे दरवाज़े की बगल में त्रिभंग-मुद्रा में एक टेढ़ी नीम खड़ी है, जिसे राह चलते एक वैष्णव बाबा जी ने नाम दे दिया था, 'कुब्जा-सुंदरी'। बाबा जी ने तो मौज में आकर इसे एक नाम दे दिया था, रात भर हमारे अतिथि रहे, फिर 'रमता योगी बहता पानी'! बाद में कभी भेंट नहीं हुई।परन्त...
लफ़्ज़ों में लरज़िश तुम्हारे लम्स कीरोशनाई में रंग तेरे अबसार कातुम्हारा ख़त मिला।मेरे देखे से लकदक हुआ गुलमोहरखिल उठा रंग गुलाबी कचनार कातुम्हारा ख़त मिला।शबे फिराक़ में पामाल दिल के काँधे परहाथ हो जैसे किसी ग़मगुसार कातुम्हारा ख़त मिला।मेरे माथे पर नसीब की दस्तकम...
 पोस्ट लेवल : सुदर्शन शर्मा कविता
आह! नहीं चाहती हो तुमकि डरी हुई हो ग़रीबी से तुम;घिसे जूतों में नहीं जाना चाहती हो बाज़ार तुमऔर नहीं चाहती हो लौटना उसी पुराने कपड़े में। मेरी प्रेयसी! पसन्द नहीं है हमें,कि दिखें हमें उस हाल में, है जो पसंद कुबेरों को;तंगहाली हमारी। उखाड़ फेंकेंगे इस...
कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व और अपार समुद्र - महोदधि और रत्‍नाकर - दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय 'पृथ्‍वी का मानदंड' कहा जाय तो गलत क्‍यों है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह जो श्रृंखला दूर...