ब्लॉगसेतु

दूर-दूर तकआदमी ऐसा कोई दिखता नहींकि कर लें यकीन उस पर एक ही बार में।यकीन मगर करना भी हैतुझ पर भीऔर मुझ पर भी।ऐसा नहीं कि यूँ करके सिर्फ मुझसे ही हैहर आदमी ही इत्तेफाकन बारहा है।हर आदमी यहाँकश्ती एक ही में सवार हैजाना है एक ही जगहऔर एक ही मझधार हैबस रंग-पो...
बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में 'धुआँ' भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर होश सम्भाले और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे। नौकर जब मुल्ला को आँ...
 पोस्ट लेवल : अनुवाद कहानी गुलजार
ज़्यादा नहींकुछ मुरझाये फूल थे यक़ीन केऔर कुछ तब्बसुम से लिखे ख़त बस यही चढ़ा करअभी अभी लौटी हूँअपने क़त्ल हुए रिश्ते की क़ब्र से..... फूल तो ख़ैर कई रोज़ सेज़रा ज़रा मुरझा रहे थेमगर हैरान हूँख़तों के अंदर की तहरीर कैसे बदल गई?... आँख नम नहीं हैहाँ,...
 पोस्ट लेवल : सुदर्शन शर्मा कविता
धरती घूमती रहती हर-पल सूरज-चन्द्र ना रुकते इक पल हल-चल में ही जड़ और चेतन उद्देश्यपूर्ण ही उनका लक्षण सदैव कार्यरत धरा-गगन है गतिशीलता ही जीवन है गति विकास है गति लक्ष्य है गति प्रवाह है गति तथ्य है धक-धक जो करता है धड़कन ...
खरगोश का एक जोड़ा था, जिनके पाँच बच्चे थे।एक दिन भेड़िया जीप में बैठकर आया और बोला - असामाजिक तत्वों तुम्हें पता नहीं सरकार ने तीन बच्चों का लक्ष्य रखा है। और दो बच्चे कम करके चला गया।कुछ दिनों बाद भेड़िया फिर आया और बोला कि सरकार ने लक्ष्य बदल दिया और एक बच्चे को...
ऐसा लगता है ज़िन्दगी तुम होअजनबी जैसे अजनबी तुम हो।अब कोई आरज़ू नहीं बाकीजुस्तजू मेरी आख़िरी तुम हो।मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँआसमानों की चांदनी तुम हो।दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदेंकिस ज़माने के आदमी तुम हो।---------------------बशीर बद्रसाभार: कविता कोश
 पोस्ट लेवल : गज़ल बशीर बद्र
जब बुनियाद ही कमजोर थीउस इमारत कीतो गिरना ही था उसेहवा-पानी से।वैसे भीकोई कहाँ टिक सका हैहवा-पानी में।इमारत गिरनी थीगिर ही गईपर वजह कुछ और थी,वैसे तो खड़ी रह सकती थीकुछ सदी और भी।पर कागज के इक टूकड़े मेंज़ोर इतना थाकि लिखावट उसकीकहर बनकर गिरी,कि जिसकी ठोकरों सेइमारत भ...
आज फिर उनके सम्मान में हजरत रंजूर अकबराबादी एडीटर, प्रिंटर, पब्लिशर व प्रूफरीडर त्रैमासिक 'नया क्षितिज' ने एक शाम-भोज दिया था।जिस दिन से प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस, एम.ए., बी.टी. गोल्ड मैडलिस्ट (मिर्जा का कहना है कि यह पदक उन्हें मिडिल में बिना नागा उपस्थिति पर म...
मैं पथ बनहर पल खड़ा हूँकितने पथिकआए-चले गए।कुछ देर तक ठहरेकुछ गहरे कहीं तक उतरेऔर पल में कुछकहानी नई कर गुजरे।कितने पथिकआए-चले गए॥ठंडक सुबह की कभीतो उमस शाम की भीकुछ चाँदनी रातेंतो भयानक दोपहर भीउदासियाँ और उबासियांबदल-बदल कर लिबास अपनावक्त संग खेलते गएवक्त में पिघल...
 तंग-संकरी गलियों से गुजरतेधीमे और सधे कदमों सेचौकीदार ने लहरायी थी अपनी लालटेनऔर कहा था - सब कुछ ठीक हैबंद जाली के पीछे बैठी थी एक औरतजिसके पास अब बचा कुछ भी न था बेचने के लिएचौकीदार ठिठका था उसके दरवाजे पर और चीखा था ऊंची आवाज में - सब कुछ ठीक हैघुप्प अ...