ब्लॉगसेतु

                                           बेचैनी में लिपटी-सी स्वयं को सबला कहती हैं,  वे आधिपत्य की चाह में व्याकुल-व्याकुल रहती हैं, सुख-...
मिट्टी हिंद की सहर्ष  बोल उठी, मिटी नहीं कहानी उनकी छायाएँ-मिटी हैं, बन पड़े फिर ठण्डी रेत पर साये कई,  साँसें जिन्होंने आज़ादी के लिये गँवायीं थींकुछ प्रतिबिम्ब दौड़े पानी की सतह पर आये,कुछ तैर न पाये तलहटी में समाये,कुछ यादें ज़ेहन में सोयीं थीं क...
लड़खड़ाते हौसलों में हिम्मत, दूब-सा दक्ष धैर्य धरा पर है अभी भी, कोहरे में डूबी दिशाएँ दरकती,  नयनों में उजले स्वप्न सजोते हैं अभी भी, रक्त सने बोल बिखेरते हृदय पर, जीने की ललक तिलमिलाती है अभी भी । कश्मकश की कश्ती में सवार,&nb...
 मैंने देखा ता-उम्र तुम्हें,    ज़िंदा है इंसानियत तुम में आज भी तुम बहुत ही बहादुर हो,  इतने बहादुर की जूझते हो स्वयं से ,   तलाशते हो हर मोड़ पर प्रेम  |देखा है तुम्हारे नाज़ुक दिल को मैंने अनगिनत बार छलनी होते...
वाक़िया एक रोज़ का... सँकरी गलियों से गुज़रता साया,छद्म मक़सद के साथ था, कुछ देखकर अनायास ठिठक गया। राम के नाम पर विचरते  राहू-केतू,आज नक़ाब चेहरे का उतर गया,है अमर ज्योति गणतंत्र की वहाँ, दबे पाँव दहशत का अँधेरा उस राह पर छा गया। स्वत...
वे सजकता की सीढ़ी से,  क़ामयाबी के पायदान को पारकर,  अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से, सुख का आयाम शोषण को बताने लगे |सुन्न हो रहे दिल-ओ-दिमाग़,   दर्द में देख मानव को मानव अटटहास करता, सूख रहा हरसिंगार-सा हृदय, पारस की चाह में...
अविज्ञात मलिन आशाओं को समेटकर, अनर्गल प्रलापों से परे,  विसंगतियों के चक्रव्यूह तोड़कर, जिजीविषा की नूतन इबारत, मूल्यों को संचित कर वह लिखना चाहती है |भोर में तन्मयत्ता से बिखेरती पराग, विभास से उदास अधूरी कल्पना छिपाती, सुने-अनसुन...
मन भीतर एक आस पले,  प्रणय की आँधी चले,   थार के दिनमान जगे,   मन संलग्नता से,  विधि का आह्वान करे,  अनल का प्रकोप रुठे,  प्रकृति ज़िंदा न जले,  सघन वन पर नीर बहा, गगन हरी देह धरा की...
अदब से आदमी,आदमी होने का ओहदा, आदमीयत की अदायगी आदमी से  करता,  आदमी इंसानियत का लबादा पहन,  स्वार्थ के अंगोछे में लिपटा इंसान बनना चाहता  |सूर्य के तेज़-सी आभा मुख मंडल पर सजा,  ज्ञान की धारा का प्रारब्धकर्ता कहलाता,&nbs...
ज़िम्मेदारी के अभाव का घूँट, अस्पताल का मुख्यद्वार पी रहा,  व्यवस्था के नाम पर, दम तोड़तीं टूटीं खिड़कियाँ,  दास्तां अपनी सुना रहीं, विवशता दर्शाती चौखट,  दरवाज़े को हाँक रही, ख़राब उपकरणों की सजावट, ...