ब्लॉगसेतु

 चंद्रभानु को विभास का, मूल्य बता तिमिर को राह दिखा रहे, खारे मोतियों को थामे अँजुरी में, परोपकार का हार सजा रहे |ज़माने का जतन नहीं, कांस के खिले फूल फुसफुसा रहे, मिलेंगे कँबल दान में, इस बार ठंड को वे यों समझा रहे |शलभ-सी प्रीत प...
पारिजात से उँघते परिवश में, लुढ़कर कहाँ से दरिंदगी की सनक आ गयी, हृदय को बींधती भविष्य की किलकारी,  नागफ़नी के काँटों-सी कँटीली, साँसों में चुभने लगी |पल रहा अज्ञानता की पराकाष्ठा में, बेटियों की बर्बर नृशस हत्याएँ, आदमजात का उफनता...
अनझिप पलकों की पतवार पर, अधबनी शून्य में झाँकती,  मन-मस्तिष्क को टटोलती,  हृदय में सुगबुगाती सहचर्य-सी,  कविता कादम्बिनी कद अपना तलाशती है | तिमिरमय सूखे नयनों में, अधखिले स्वप्न साजा, जिजीविषा की सुरभि मे...
 घटनाएँ लम्बी कतार में बुर्क़ा पहने  सांत्वना की  प्रतीक्षा में लाचार बन  खड़ी थीं | देखते ही देखते दूब के नाल-सी बेबस कतार  और बढ़ रही थी |समय का हाल बहुत बुरा था 1920 का था अंतिम पड़ाव&nb...
 यादें तुम्हारी, अनगिनत यादें ही यादें,  छिपाती हूँ, जिन्हें व्यस्तता के अरण्य में,  ख़ामोशी की पतली दीवार में, ओढ़ाती हूँ, उनपर भ्रम की झिमि चादर,  मुस्कुराहट सजा शब्दों पर,  अकेलेपन की बातों...
  अल्हड़ आँधी का झोंका भी ठहराव में, शीतल पवन का साथी बन जाता है,   परिवेश में दौड़ता हुआ,  मुठ्ठी में छिपाता है आहत अहं के तंतु, बिखरकर वही द्वेष बन जाता है |विचलित मन मज़बूरियाँ बिखेरता है, सिसकता है साँसों में जोश, ...
तल्ख़ियाँ तौल रहा तराज़ू से ज़माने नैतिकता को क्षणभँगुर किया,    दौर फिर वही वक़्त दोहराने लगा,  हटा आँखों से अहम-वहम की पट्टीवक़्त ने फ़रेब का शृंगार किया | संस्कारों में है सुरक्षित आज की नारी,   एहसास यही लगा...
प्रति वर्ष आते हो तुम लाखों की तादात में इस बार हुआ क्या ऐसा प्रवासी पक्षी तुम्हारी जान को सर्दियों में मेहमान बन मेरे  मान मेरा बढ़ाते हो  ख़ुशी से सीना मेरा  फूला नहीं समाता है गर्वित हो उठती हूँ देखो !तुम्हारे...
उन  पथरायी-सी आँखों  पर, तुम प्रभात-सी मुस्कुरायी,  मायूसी में डूबा था जीवन मेरा तुम बसंत बहार-सी बन आँगन में उतर आयी,  तलाश रहे थे ख़ुशियाँ जहां में,  मेहर बन हमारे दामन में तुम खिलखिलायी |चमन में मेरे सितारों-सी चह...
  समय के साथ समेटना पड़ता है वह दौर,   जब हम खिलखिलाकर हँसते हैं, बहलाना होता है उन लम्हों को,  जो उन्मुक्त उड़ान से अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करते हैं,  गठरी में बाँधनी पड़ती है, उस वक़्त धूप-सी बिखरी कुछ गु...