ब्लॉगसेतु

टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,बना लेखनी वह कविता।पीर परायी धरुँ हृदय पर,छंद बहे रस की सरिता।मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,पूछ पवन संदेश बहे।प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,भानु-तपिश जो देख रहे,जनमानस की हृदय वेदना,अहं झूलती सृजन कहे।पथ ईशान सारथी लिख दूँ,विहान कलरव की सुनीता।टूट...
बीज रोप दे बंजर में कुछ,यों कोई होश नहीं खोता,अंशुमाली से मोती मन केक्यों पीड़ा पथ में तू बोता।मधुर भाव बहता जीवन में,प्रीत प्रसून फिर नहीं झरता,विरह वेदना लिखे लेखनी,यों पाखी प्रेम नहीं मरता।नभ-नूर बिछुड़ तारीकाएँ,  व्याकुल होकर पुष्कर रोता, बीज रोप...
शून्य नभ से झाँकते तारों की पीड़ा,हिंद-हृदय सजाता अश्रुमाला आज, मूक स्मृतियों का सिसका खंडहर हूँ मैं, आलोक जगत में देख धधकते प्राण,चुप्पी साधे बिखरता वर्तमान हूँ मैं।कलुषित सौंदर्य हुआ,नहीं विचार सापेक्ष,जटिलताओं में झूलता भावबोध हूँ मैं,उत्थान की अभिलाषा...
 शुभ्र-लालिमा को लपेटे देह से, भटकते दिन का ढलता पहर, महताब संग बढ़ते पदचाप,  देख जीवन में हर्षायी साँझ। शरद चाँदनी से उजले हाथों में, मेहंदी के मोहक उठाये पात , पुलकित हृदय से इठलायी, हर्षित फ़ज़ा से झूमी साँझ।कमल-पँखुड़िय...
वे स्वतः ही पनप जाते हैं,गंदे गलियारे मिट्टी के ढलान पर,अधुनातन मानव-मन की बलवती,हुई आकांक्षा की तरह ।रेगिस्तान-वन खेत-खलिहान घर-द्वार, मानवीय अस्तित्त्व से जुड़ी बुनियादी तहें, इंसानी साँसों को दूभर बनाते अगणित बीज, गाजर घास बन गयी है अब मानवता...
प्रदूषण के प्रचंड प्रकोप से ,  दम तोड़ता देख धरा का धैर्य,   बरगद ने आपातकालिन सभा में,   आह्वान नीम-पीपल का किया।  ससम्मान सत्कार का ग़लीचा बिछा, बुज़ुर्ग बरगद ने दिया आसन प्रभाव का,  विनम्र भाव से रखा...
पन्ना धाय तुम्हारे आँसुओं से भीगे, खुरदरे मोटे इतिहास के पन्ने, जिनमें सीलन मिलती है आज भी,कर्तव्यनिष्ठा राष्ट्रप्रेम की।ज़िक्र मिलता है ममत्व में सिमटी, तुम्हारे भीगे आँचल की मौन कोर का,   पुत्र की लोमहर्षक करुण कथा का बखान, ...
तुम जूझ रहे हो स्वयं से, या उलझे हो,भ्रम के मकड़जाल में ,    सात्विक अस्तित्त्व के,   कठोर धरातल पर,  लदे हो या,इंसान की देह पर, ज़िंदा लाश की तरह, ढो रहे हो स्वयं को,मर रही मानवता में, चेहरा अपना छिपाये हो,&nbsp...
सोलह बसंत बीते, बाँधे चंचलता का साथ,   आज सुनी ख़ुशियों की, प्रफुल्लित पदचाप,  घर-आँगन में बिखरी यादें,  महकाती बसंत बयार,  छौना मेरा यौवन की, दहलीज़ छूने को तैयार ।गगन में फैली चाँदनी-सा, शुभ्रतामय यश...
परिमल महक पंखुड़ी-सा स्मृति-वृंद, चहुँ-दिशि हरित-छटाएँ फैलाती है,   खनकती पायल-सी हृदय में, बनती भँवरे की गुँजार है |नयनों पर मायाविनी-सी रचती, कुछ पल सपनों का संसार है, लताओं के कुँज में छिपी, अहर्निश प्रतीक्षा तुम्हारी बारंब...