ब्लॉगसेतु

वे …,चले आ रहे हैं सदियों से…आज इसके साथतो कल उसकेआँखें बन्द करने सेजो हैं वेबदलते कहाँ हैं ?चल रहें हैं जल , थल ,अग्नि ,वायु और आकाश जैसेपंचभूत बनप्राणों के साथ …,जब होते हैंमन मुताबिक तोदेते हैं …,असीम आनन्दतो कभी चाबुक से बरसदुख भी देते हैंसुनो…,हम दोन...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
संभल कर चल !सांझ के साये में...,सांझ के साये मेंघूमते हैं नर-पिशाचतेरे संभले डगऔर तेरी बुद्धिमता…,तेरा रक्षा कवच हैखुद पर कर यकीन तेरा यकीन हीदेगा तुझे ताकतमहिषासुरमर्दिनी सी …,जानती तो है तू !दोधारी तलवार है तेरी जिन्दगी…अबला है तो...रोती क्यों हैं ?सबला...
"बेटी"बेटी घर का मान है, मन उपवन का फूल ।मात-पिता की लाडली , यह मत जाओ भूल ।।यह मत जाओ भूल , याद रखना नर-नारी ।रखती सब का मान , मान की वह अधिकारी ।।कह 'मीना' यह बात, करो मत यूं अनदेखी ।बेटों सम अधिकार , हम से मांगे है बेटी"किसान"जी तोड़ मेहनत करे , खेतों बीच किसान ।...
आड़ी-टेढ़ी पगडंडी ,और उसके दो छोर ।एक दूजे से मिलने की ,आस लिए चले जा रहे हैं ।उबड़-खाबड़ रास्तों से  ,कभी पास-पास , कभी दूर-दूर ।हमें आपस में बाँधने को ,ना पगडण्डी है , और ना ही कोई कूल-किनारा ।मगर फिर भी ,बन्धन तो बन्धन है ।हमें बाँधता है ,सब की 'आँखों का त...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
नारी का व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव रचनाकारों की लेखनी का प्रिय विषय रहा है । मैं भी इस भावना से परे नहीं हूँ । मुझे नारी का गृहस्थ जीवन की धुरी होने के साथ-साथ उसका कर्मठ और बुद्धिमतापूर्ण व्यक्तित्व बहुत मोहता है । नारी के उसी सशक्त रुप को अपनी लेखनी से अंकित करने...
 पोस्ट लेवल : कविताएँ
(1)वृक्षों के जैसा कोई उपकारी नही हैनष्ट करना इनको समझदारी नही है।पोषित इन के दम पर पूरा पर्यावरणवन रक्षण क्या सबकी जिम्मेदारी नहीं है( 2 )स्व को कर परमार्जित हम आगे बढ़ते हैं ।अपनी 'मैं' को भूल कर सबकी सुनते हैं ।।हो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का भाव ।करे उन्नति सम्...
 पोस्ट लेवल : मुक्तक
शाश्वत आभामनस्वी नगपतिआदि सृष्टि सीस्वर्णिम रश्मियांसौन्दर्य स्थितप्रज्ञमानस-सरअमृत सम अम्बुनिर्बन्ध मुक्तसुषमा नैसर्गिकदृग-मन विस्मितपुष्प गुच्छ सीसुवासित मधुरम्विबुध धराहिमगिरि आंचलप्रकृति अनुपम★★★★★
 पोस्ट लेवल : ताँका
(1)थके तन में बोझल मनडूब रहा है यूं .....जैसे..अतल जल मेंपत्थर का टुकड़ा(2)स्नेहिल अंगुलियों कीछुवन मांगता है मन..बन्द दृगों की ओट मेंनींद नहीं..जलन भरी है(3)दिखावे से भरपूरढेर सारी गर्मजोशीआजकल केरिश्ते-नाते भी ..हायब्रिड गुलाब जैसे लगते हैं★★★
 पोस्ट लेवल : क्षणिकाएँ
उसकी दिनचर्या तारों भरी भोर से आरम्भ हो अर्द्धरात्रि में नीलाकाश की झिलमिल रोशनी के साथ ही समाप्त होती थी । अक्सर काम करते करते वह प्रश्न सुनती - "तुम ही कहो ? कमाने वाला एक और खाने वाले दस..मेरे बच्चों का भविष्य मुझे अंधकारमय ही दिखता है ।" और वह सोचती रह जाती..,त...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
(1)बेसबब नंगे पाँव ...भागती सी जिन्दगीकट रही है बस यूं …जैसे एक पखेरु लक्ष्यहीन उड़ान में...समय के बटुए सेरेजगारी खर्च रहा हो …(2)नेह के धागों से बुनी थी वह  कमीजवक्त के साथ...नेह के तन्तुसूखते गए और….कमीज की सींवन दुर्बलएक युग  के बादधूल अटी गठर...
 पोस्ट लेवल : क्षणिकाएँ