ब्लॉगसेतु

--दुनिया के इतिहास में, दिवस आज का खास।अपने भारत देश में, जन्मा वीर सुभास।।--जीवित मृत घोषित किया, सबको हुआ मलाल।सत्ता पाने के लिए, चली गयी थी चाल।।--क्यों इतने भयभीत हैं, शासन में अधिराज।नहीं उजागर हो सका, नेता जी का राज।।--इस साजिश पर हो रहा, सबको पश्चाताप।नेता ज...
 पोस्ट लेवल : दोहे यह उपवन आजाद
मित्रों! 21 जनवरी मेरे लिए इतिहास से कम नहीं है! क्योंकि आज के ही दिन मैंने ब्लॉगिंग की दुनिया में अपना कदम बढ़ाया था।     आज से ठीक 12 वर्ष पूर्व मैंने उच्चारण नाम से अपना ब्लॉग बनाया था और उस पर अपनी प...
--अंग दिखाने का बढ़ा, कैसा आज जुनून।नयी पौध की है फटी, जगह-जगह पतलून।।--सिने-तारिका कर रहीं, लचर आज परिधान।चलता-फिरता हास्य अब, लगता है इंसान।।--भारतीयता बन गयी, कोरा आज मजाक।भौंडा फैशन देखकर, दुनिया है आवाक।।--लायेगा मधुमास क्या, तन पर नूतन पात।बिन पतझड़ जब हो...
 पोस्ट लेवल : दोहे नंगेपन के ढ़ंग
--हिमगिरि के शिखरों से चलकर,कलकल-छलछल, बहती अविरल,कुदरत का उपहार कहाँ है?निर्मल गंगा धार कहाँ है??--मैदानों पर रूप निखारा,दर्पण जैसी निर्मल धारा,अर्पण-तर्पण करने वाली,सरल-विरल चंचल-मतवाली,पौधों में भरती हरियाली,अमल-धवल गुंजार कहाँ है?निर्मल गंगा धार कहाँ है??-...
--चाहे कोई कल्प हो, या हो कोई काल।माता निज सन्तान को, रही प्यार से पाल।।-- सुख-दुख दोनों में रहे, कोमल और उदार।कैसी भी सन्तान हो, माता करती प्यार।। --पीर पराई झेलना, बहुत कठिन है काम।कलियुग में कैसे भला, पैदा होंगे राम।।-- भावनाओं...
--कल-कल करती व्यास-विपाशा।मन की बुझती नहीं पिपासा।। --प्यास कहो या आस कहो तुम,तृष्णा-इच्छा, लोभ निराशा,पल-पल राग सुनाता मौसम,जीवन में उगती अभिलाषा।--तन की तृषा भले बुझ जाये,लेकिन मन रहता है प्यासा,कभी अमावस कभी चाँदनी,दोनों करते खेल-तमासा।मन की बुझती नहीं पिपासा...
--सन-सन शीतल चला पवन,सरदी ने रंग जमाया।ओढ़ चदरिया कुहरे की,सूरज नभ में शर्माया।।--जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू,कोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू,दादा जी ने अपने तन पर,कम्बल है लिपटाया।ओढ़ चदरिया कुहरे की,सूरज...
धनु से मकर लग्न में सूरज, आज धरा पर आया।गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।गंगा जी के तट पर, अपनी खिचड़ी खूब पकाओ,खिचड़ी खाने से पहले, तुम तन-मन शुद्ध बनाओ,आसमान में खुली धूप को सूरज लेकर आया।गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।--स्वागत करो बसन्त ऋतु का,...
--कुहरे और सूरज दोनों में,जमकर हुई लड़ाई।जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।--ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता,लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता,बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई।जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।--साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो...
--उत्तरायणी पर्व के, भिन्न-भिन्न हैं नाम।आया लेकर हर्ष को, उत्सव ललित-ललाम।।--गंगा में डुबकी लगा, पावन करो शरीर।नदियों में बहता यहाँ, पावन निर्मल नीर।।--जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढंग।बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।।--सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, ख...