ब्लॉगसेतु

--दीप खुशियों के जलाओ, आ रही दीपावली।रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।--क्या करेगा तम वहाँ, होंगे अगर नन्हें दिए,रात झिल-मिल कर रही, नभ में सितारों को लिए,दीन की कुटिया में खाना, खा रही दीपावली।रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।--नेह के दीपक सभी को, अब जलाना चाहिए...
 --आई चौदस रूप की, चहक रहे घर द्वार।कुटिया-महलों में सजे, झालर-बन्दनवार।१।--सारी दुनिया से अलग, भारत के अंदाज।दीपक यम के नाम का, जला दीजिए आज।२।--साफ-सफाई को करो, सुधरेगा परिवेश।देती नरकचतुर्दशी, सबको यह सन्देश।३।--जन्मे थे धनवन्त...
--करते हमें निरोग जो, हरते हैं अवसाद।उन धन्वन्तरि देव को, आज कीजिए याद।। --धनतेरस के पर्व पर, सजे हुए बाज़ार।घर में अपने ला रहे, लोग नये उपहार।।-- झालर-दीपों से सजें, आज सभी के नीड़।धरती पर पसरी हुई, तारों की है भीड़।।-- चलकर आई धरा पर, चन...
उदात्त भावनाओं की शायरी       अदबी दुनिया में साधना वैद अब तक ऐसा नाम था जो काव्य के लिए ही जाना जाता था। किन्तु हाल ही में इनका कथा संग्रह “तीन अध्याय” और बाल कथा संग्र “एक फुट के मजनूँमियाँ” प्रकाशि...
--तन के हों निर्धन भले, मन रक्खो धनवान।मन के भीतर है भरा, दुनियाभर का ज्ञान।।--माटी का दीपक भले, कितना रहे कुरूप।जलकर बाती नेह की, फैला देती धूप।।--दीवाली पर द्वार को, कभी न करना बन्द।झिलमिल करते दीप ही, देते हैं आनन्द।।--सदा स्वदेशी का करो, जीवन म...
 पोस्ट लेवल : दोहे आवश्यक सामान
दिल से निकले ज़द्बातों की शायरी “सब्र का इम्तिहान बाकी है”      अभी कल ही की तो बात है। मैं तीन पुस्तकों के विमोचन के कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ। जिनमें डॉ. सुभाष वर्मा कृत कत्आत और ग़ज़लों का  एक संग्रह “सब्र का इम्तिहान ब...
--सारे जग से भिन्न है, अपना भारत देश।रहता बारह मास ही, पर्वों का परिवेश।। --पर्व अहोई-अष्टमी, दिन है कितना खास।जिसमें पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास।।-- दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद।बेटा-बेटी में जहाँ, दुनिया करती भेद।।-- पुरुषप्र...
 उदात्त भावनाओं की शायरी“पेपरवेट”      पंजाबी मूल के कृषक परिवार में 1980 में जन्मी पेशे से शिक्षिका श्रीमती राजविन्दर कौर एक कामकाजी महिला हैं। मैंने अपनी अनुभवी दृष्टि से अक्सर यह देखा है कि कामकाजी महिलाओं का अधिकांश समय अपन...
--कर्णधारों की कुटिलता देखकर,देश का दूषित हुआ वातावरण।सभ्यता, शालीनता के गाँव में,खो गया जाने कहाँ है आचरण?--सुर हुए गायब, मृदुल शुभगान में,गन्ध है अपमान की, सम्मान में,आब खोता जा रहा अन्तःकरण।खो गया जाने कहाँ है आचरण?--शब्द अपनी प्राञ्जलता खो र...
--सवाल पर सवाल हैं, कुछ नहीं जवाब है।राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।--गीत भी डरे हुए, ताल-लय उदास हैं.पात भी झरे हुए, शेष चन्द श्वास हैं,दो नयन में पल रहा, नग़मग़ी सा ख्वाब है।राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।--ज़िन...
 पोस्ट लेवल : पथ नहीं सरल यहाँ गीत