ब्लॉगसेतु

anup sethi
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सुमनिका द्वारा करीब पचीस साल पहले चारकोल से बनाया गया स्केच यह थकना भी कोई थकना है लल्लू! हम अजीबोगरीब वक्त में फंस गए हैं । एक तरह से सारी दुनिया ही ठहर सी गई है । आगे हम लोगों को जीवन कैसा होगा कुछ पता नहीं ।  कुछ लोग कोरोना के शिकार हो गए हैं, कुछ उन्ह...
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विष्‍णु खरे : अधूरी रह गई एक बातचीत, रमेश राजहंस के घर विष्‍णु खरे : जब मैं उन्‍हें विजय कुमार जी के घर ले गया विष्‍णु खरे : विजय कुमार जी के साथ हमारे घर परविष्‍णु खरे : काल और अवधि के दरमियान की प्रति विष्‍णु खरे: पाठान्‍तर की प्रतिलिखते कुछ बन नही...
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                      कागज पर पेंसिल से रेखांकन : मुदित अर्ध शती पर मुक्‍तिबोध को याद करते हुए काल-प्रस्‍तर पर प्रहार मुक्तिबोध की छेनी से ही किया जा सकता है ह...
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मैं बचपन में गांव में था तो स्कूल की कोई याद नहीं है, कब लगता था कब छूटता था। बस आना जाना भर याद है। रास्ते में एक खड्ड पड़ती थी। जंगल था। झाड़ियां थीं। उनमें फल होते थे। जंगली बेर होते थे। यही सब याद है। घर में ट्रक के टायर से निकाले हुए रबड़ के सख्त चक्के को 'गड्...
 पोस्ट लेवल : टिप्पणी अंतर्नाद
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रात दो बजे का वक्त है। पंजाब का एक खदबदाता हुआ शहर - लुधियाना। कहते हैं लुधियाना के लोग विदेश जा बसे हैं। यह एनआरआइयों का शहर है। चमक दमक और ठसक को देखकर लगता है वाकयी यह एनआरआइयों का ही शहर है। लेकिन जितने गए हैं उतने ही रह भी तो गए हैं। तभी तो गमकता है शहर। ये ख...
 पोस्ट लेवल : अंतर्नाद
anup sethi
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जमाना बदलता है तो उसकी चाल ढाल भी बदलती है। रंग ढंग भी बदलते हैं। क्या चाल ढाल और रंग ढंग से ही जमाने की पहचान होती है? पूरे तौर पर न होती हो, नब्ज तो पकड़ में आ ही जाती है। बाबू की पहचान हुआ करती थी कमीज, धोती या पाजामा, जूता और टोपी। टटपूंजिया बाबू होगा तो सब्जी...
 पोस्ट लेवल : अंतर्नाद