ब्लॉगसेतु

अजय  कुमार झा
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पिछले एक सप्ताह के एकांतवास में ,छत पर अपनी बगिया में सत्तर अस्सी पौधे लगा चुका हूँ | फूल पत्तों के अलावा फिलहाल तोरी ,भिंडी ,घीया ,पालक ,धनिया ,नीम्बू मिर्च सब उगाई लगाई जा रही है | दिन का  अधिक समय छत पर बनी इस बगिया नुमा आँगन में ही बीत रहा है | सुबह शाम झा...
rishabh shukla
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Aloneना कोई दोस्त मेरा,ना है हमदर्द कोई,अपना कहने को तो कई,लेकिन अपनापन नहीं है|मैं अकेला हूँ...ना कोई है हँसी,ना कोई ठिठोली करने वाला,दर्द देने को कई तैयार बैठे हैंलेकिन कोई हमदर्द नहीं है|मैं अकेला हूँ....कोई कैसे इतना,उलझ जाता है जिंदगी में,की भूल जाता है,कि कोई...
kumarendra singh sengar
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आत्महत्या एक ऐसा शब्द है जो सिवाय झकझोरने के और कोई भाव पैदा नहीं करता. यह महज एक शब्द नहीं बल्कि अनेकानेक उथल-पुथल भरी भावनाओं का, विचारों का समुच्चय है. यह शब्द मौत की सूचना देता है. किसी व्यक्ति के चले जाने की खबर देता है. सम्बंधित व्यक्ति के परिचितों के दुखी हो...
Yashoda Agrawal
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तबीयत हमारी है भारी सुबह से कि याद आ गई है तुम्हारी सुबह से न थी घर में चीनी तो कल ही बताती करेगा न बनिया उधारी सुबह से बता दे कि हम ख़ुद ही सोए थे भूखे खड़ा अपने द्वारे भिखारी सुबह से न उसकी हमारी अदावत पे जाओ हुआ रात झगड़ा, तो य...
kumarendra singh sengar
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एक कार्यक्रम में एक विशेषज्ञ युवाओं और किशोरों से सम्बंधित समस्या पर प्रकाश डाल रहे थे. बातचीत के दौरान उन्होंने आत्महत्या के दो बिंदु बताये. उनके द्वारा बताई चंद बातों का सार ये निकलता है कि एक स्थिति  में आत्महत्या करने वाला व्यक्ति इसकी पूरी तैयारी कर चुका...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लदूसरों के वास्ते बेहद बड़ा हो जाऊं मैंइसकी ख़ातिर अपनी नज़रों से भी क्या गिर जाऊं मैंएक इकले आदमी की, कैसी है जद्दो-जहदकौन है सुनने के क़ाबिल, किसको ये दिखलाऊं मैंजब नहीं हो कुछ भी तो मैं भी करुं तमग़े जमाबस दिखूं मसरुफ चाहे यूंही आऊं जाऊं मैंबहर-वहर, नुक्ते-वुक्ते,...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लया तो बेईमानी-भरी दुनिया से मैं कट जाऊंया कि ईमान के चक्कर में ख़ुद निपट जाऊंतुम तो चाहते हो सभी माफ़िया में शामिल होंतुम तो चाहोगे मैं अपनी बात से पलट जाऊं न मैं सौदा हूं ना दलाल न ऊपरवालालोग क्यों चाहते हैं उनसे मैं भी पट जाऊं मेरे अकेलेपन को मौक़ा मत समझ...
Sanjay  Grover
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PHOTO by Sanjay Groverवे अकेले पड़ गए थे।कोई समाज था जो उन्हें स्वीकार नहीं रहा था।कोई भीड़ थी जो उनके खि़लाफ़ थी।कोई समुदाय था जो उन्हें जीने नहीं दे रहा था।कोई व्यवस्था थी जो उनसे नफ़रत करती थी।कोई बेईमानी थी जिसने उनके खि़लाफ़ साजिश रची थी।मैंने बस थोड़ी-सी मदद कर दी...
Ravindra Pandey
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कुछ पल जो अकेला होता हूँ,शब्दों की माला पिरोता हूँ,लिखता हूँ अपने दिल की बात,हँस कर आँखों को भिगोता हूँ..कुछ पल जो....दिल के जख्म दिखाएं किसे,ये दर्द करें किसको बयां,पथरीली ये जमीन हुई,चुभता है अब आसमां,इस लब पे बिखेरे हुए हँसी,मैं दिल ही दिल में रोता हूँ...लिखता ह...
ANITA LAGURI (ANU)
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कभी चाहा नहीं कि  अमरबेल-सी तुमसे लिपट जाऊँ ..!!कभी चाहा नहीं कीमेरी शिकायतेंरोकेंगी तुम्हें...!चाहे तुम मुझे न पढ़ने की बरसों की पीड़ा का त्याग  करो न  करो।        हाँ !ख़ामोशी  से जलनाआता है मुझ...