ब्लॉगसेतु

डा. सुशील कुमार जोशी
8
कागज पर लिखा जमीन का कुछ भी उसके लिये बेकार होता है चाँद तारों पर जमा जमाया जिसका कारोबार होता है दुनियाँ जहाँ पर नजर रखता है बहुत ज्यादा समझदार होता है घर की मोहल्ले की बातें छोटे लोगों का रोजगार होता है बेमतलब कुछ भी कह डालिये तुरंत पकड़ लेता है कलाकार होता है मतल...
Lokendra Singh
102
हिंदी पत्रकारिता दिवस, 30 मई 1826'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' इस उद्देश्य के साथ 30 मई, 1826 को भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी जाती है। पत्रकारिता के अधिष्ठाता देवर्षि नारद के जयंती प्रसंग (वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया) पर हिंदी के पहले समाचार-पत्र 'उदंत मार्...
Lokendra Singh
102
आज की पत्रकारिता के समक्ष जैसे ही गोकशी का प्रश्न आता है, वह हिंदुत्व और सेकुलरिज्म की बहस में उलझ जाता है। इस बहस में मीडिया का बड़ा हिस्सा गाय के विरुद्ध ही खड़ा दिखाई देता है। सेकुलरिज्म की आधी-अधूरी परिभाषाओं ने उसे इतना भ्रमित कर दिया है कि वह गो-संरक्षण को सा...
डा. सुशील कुमार जोशी
8
तबीयत ठीक रहती है तो बड़ा झूठ बहुत आसानी से पचाया जाता है बकवास लिखी जाती रहती है तो सच भी नंगा होने में शरमाता है जिंदगी निकलती जाती है झूठ ही सबसे बड़ा सच होता है समझ में आता जाता है हर कोई एक नागा साधू होता है कपड़े सब के पास होते हैंं तो दिखाने भी होते हैं इसी...
डा. सुशील कुमार जोशी
8
फिर हुवा हुवा का शोर हुवा इधर से गजब का जोर हुवा उधर से जबरजोर हुवा हुवा हुवा सुनते ही मिलने लगी आवाजें हुवा हुवा की हुवा हुवा में हुवा हुवा से माहौल सारा जैसे सराबोर हुवा चुटकुला एक एक बार फिर अखबार में खबर का घूँघट ओढ़ दिखा आज छपा हुवा खबरों को उसके अगल बगल की पता...
डा. सुशील कुमार जोशी
8
(उलूक को बहुत दूर तक दिखायी नहीं  देता है । कृपया दूर तक फैले देश से जोड़ कर मूल्याँकन करने का कष्ट ना करें। जो  लोग  पूजा में व्यस्त हैं  अपनी आँखे बंद रखें। बैकुण्ठी  के फिर से अवतरित होने के लिये मंत्र जपने शुरु करें)कई दिन हो गये जमा करत...
डा. सुशील कुमार जोशी
8
गिरोह पर्दे के पीछे से जल्दी ही कुछ उल्टा करने जा रहा है सामने से हो रही अच्छी सीधी बातों से समझ आ रहा है अखबार सरदार की भेजी खबर को सजा कर दिखा रहा हैजरूरत मंदों के लिये संवेदना देख कर सब गीला हो जा रहा है शहर में कुछ नया अजूबा होने के आसार मौसम विभाग सुना रहा...
Lokendra Singh
102
- लोकेन्द्र सिंह -एक उम्र होती है, जब अपने भविष्य को लेकर चिंता अधिक सताने लगती है। चिकित्सक बनें, अभियंत्री बनें या फिर शिक्षक हो जाएं। आखिर कौन-सा कर्मक्षेत्र चुना जाए, जो अपने पिण्ड के अनुकूल हो। वह क्या काम है, जिसे करने में आनंद आएगा और घर-परिवार भी अच्छे से च...
डा. सुशील कुमार जोशी
8
फिर एक साल निकल लिया संकेत होनी के होने के नजर आना शुरु हुए अपनी ही सोच में खुद की सोच का ही कुछ गीला हिस्सा शायद फिर से आग पकड़ लिया धुआँ नहीं दिखा बस जलने की खुश्बू आती हुयी जैसा कुछ महसूस हुआ निकल लिया उसी ओर को सोचता हुआ देखने के लिये अगर हुआ है कुछ तो क्या हुआ...
Lokendra Singh
102
- लोकेन्द्र सिंह -स्वदेश ग्वालियर समूह की ओर से प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाले दीपावली विशेषांक की प्रतीक्षा स्वदेश के पाठकों के साथ ही साहित्य जगत को भी रहती है। समृद्ध विशेषांकों की परंपरा में इस वर्ष का विशेषांक शुभ उजाले से भरा हुआ है। प्रेरणा देने वाली कहानियां,...