ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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 कुछ हर्षाते लम्हे अनायास ही मौन में मैंने धँसाये  थे  आँखों  के पानी से भिगो कठोर किया उन्हें  साँसों की पतली परत में छिपा ख़ामोश किया था जिन्हें फिर भी  हार न मानी उन्हो...
अनीता सैनी
41
 उस मोड़ पर जहाँ  टूटने लगता है बदन छूटने लगता है हाथ देह और दुनिया से उस वक़्त उन कुछ ही पलों में उमड़ पड़ता है सैलाब यादों का  उस बवंडर में तैरते नज़र आते हैं अनुभव बटोही की तरह ...
PRABHAT KUMAR
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अतीत याद करके यूँ न हो उदासछोड़ दो उस राह को जो ले जाए उसके पास। स्मृतियां अनसुलझी सी हों तो सुलझा नहीं पाएंगे हमकिसी बिछड़े राही को राह दे नहीं पाएंगे हमकहानी के किसी पात्र को खोने से अच्छा भूल जाओलहरों में डूबना अच्छा है, डूबना न बिछड़ों के पासअतीत याद करके यूँ न ह...
Sanjay  Grover
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हमारे यहां ‘पराग’ और ‘चंपक’ जैसी बाल पत्रिकाएं आतीं थीं। कभी-कभार ‘लोटपोट’, ‘दीवाना’ वगैरह कहीं से मिल जाएं तो पढ़ लेते थे। ज़्यादातर दूसरे बच्चे ‘नंदन’ और ‘चंदामामा’ पढ़ते थे। ये दोनों ख़ूब बिकतीं थीं। मगर मैं नहीं पढ़ पाता था क्योंकि इनमें अकसर सभी कहानियां राजा-रान...
kuldeep thakur
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इंडिया-इंडिया कहते-कहते,हम हिंदूस्तान को भूल गये,आजाद हो गये लेकिन फिर भी,अपनी पहचान ही भूल गये।...जलाते हैं दिवाली में पटाखे,खेलते हैं रंगों से होली,याद रहा रावण को जलाना,राम-कृष्ण को भूल गये...नहीं पता अब बच्चों को,बुद्ध,  महावीर, गोविंद  कौन हैं?मुगलों...
kuldeep thakur
247
इस कड़ाके की सर्दी में,वो इकठ्ठा परिवार ढूंढता   हूं। दादा दादी की कहानियां,चाचा-चाची का प्यार ढूंढता   हूं...खेलते थे अनेकों खेल,लगता था झमघट बच्चों का,मोबाइल, टीवी के शोर में,बच्चों का संसार ढूंढता  हूं...लगी रहती थी घर में,अतिथियों&...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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आओ   अब   अतीत   में   झाँकेंआधुनिकता   ने   ज़मीर  क्षत-विक्षत    कर  डाला   है. भौतिकता   के प्रति   यह   कैसी   अभेद्य   निष्ठा दर्पण  पर  धूल  छतों   पर   म...
kuldeep thakur
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हम जलाते हैं हर बार,पुतला केवल रावण का,जिसने अपनी बहन के अपमान काबदला लेने की खातिरसीता जी का हरण किया।न स्पर्श किया,न अपमान किया,अशोक-वाटिका में,अतिथि सा मान दिया।हम दशहरे के दिन, भूल जाते हैं,आज के उन रावणों को,जिन्हें न तीन वर्ष की बेटी की,मासूमियत दिखती है...
mahendra verma
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  ज़रा-ज़रा इंसाँ हो जाओ मन को सुकून मिलना तय है, अगर देवता बन बैठे तो हरदम दोष निकलना तय है । सूरज गिरा क्षितिज के नीचे   सुबह सबेरे फिर चमकेगा, चलने वालों का ही गिरना उठना फिर से चलना तय है । जब अतीत की गहराई से   यादों का लावा-सा निकल...
kuldeep thakur
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न बच्चों के हाथ में,कागज की कश्तियाँ न इंतजार है,परदेस से   पिया का।नहीं दिखते अब    झूलें बागों में,   न मेलों मे रौनक,न तीज त्योहारों में।अब तो सावनडराता है,विक्राल रूपदिखाता है।कहीं बाड़ आती है,कहीं फटते हैं बादल,होती है प्रलय,करहाते हैं...