ब्लॉगसेतु

Harash Mahajan
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फिल्मी जगत की कुछ कही अनकही बातें ।***********************************इस सीरीज में हम बात करेंगे फिल्मी जगत में घटी कुछ ऐसी घटनाओं की जिनकी जानकारी सिर्फ कुछ विरले ही लोगों के पास होगी । औऱ जहां तक उन हस्तियों की बात है जिनके बारे में घटनाओं का ज़िक्र है संभवत: वही...
 पोस्ट लेवल : अनकही
Shachinder Arya
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वह एक खाली-सी ढलती दोपहर थी। दिमाग बेचैन होने से बिलकुल बचा हुआ।किताबें लगीं जैसे बिखरी हुई हों जैसे. कोई उन्हें छूने वाला नहीं था. कभी ऐसा भी होता, हम अकेले रह जाते हैं।किताबों के साथ कैसा अकेलापन. उनकी सीलन भरी गंध मेरी नाकों के दोनों छेदों से गुज़रती हुई पता नहीं...
Shachinder Arya
157
कभी होता, उसके खर्राटों से वह ख़ुद जग जाता। जग जाता के साथ लेटे सब न जग जाएँ। सबके सोते रहने पर वह उठता। उठकर बैठ जाता। बैठना, थोड़ी रौशनी के साथ होता। रात उस खयाल में ख़ुद को अकेले कर लेने के बाद खुदसे कहीं चले जाने लायक न बचता, तो ख़ूब रोता। आँसू नहीं आते। याद आती। य...
Shachinder Arya
157
दुनिया कितनी बड़ी है। इसके बीतते एक एक पल में इतनी सारी चीज़ें एक साथ घटित हो रही हैं, जिन्हें कह पाने की क्षमता मुझ अकेले में नहीं है। लिख तो तब पाऊँ जब उनतक मेरी पहुँच हो। दरअसल यह बात मुझे मेरी औकात बताने के वास्ते है। मैं कोई इतना दिलचस्प या गंभीर लेखक या अध्येता...
Shachinder Arya
157
मुझे नहीं पता लोग कैसे लिखते हैं। पर जितना ख़ुद को जानता हूँ, यह लिखना किसी के लिए भी कभी आसान काम नहीं रहा। हम क्यों लिख रहे हैं(?) से शुरू हुए सवाल, कहीं भी थमते नहीं हैं। उनका सिलसिला लगातार चलता रहता है। पर एक बात है, जो इस सवाल का एक ज़वाब हो सकती है। वह यह कि ह...
Shachinder Arya
157
कहीं कोई होगा, जो इस मौसम की ठंडक को अपने अंदर उतरने दे रहा होगा। कोई न चाहते हुए भी ऐसा करने को मजबूर होते हुए खुद को कोस रहा होगा। दुनिया में इन दो तरह के लोगों के अलावे भी कई और शैदाई होंगे, जो उन सड़कों, गलियों, अनदिखे मोड़ों पर रुककर, किसी अनजाने एहसास का इंतज़ार...
Shachinder Arya
157
एक बात साफ़ तौर पर मुझे अपने अंदर दिखने लगी है। शायद कई बार उसे कह भी चुका हूँ। शब्द भले वही नहीं रहते हों पर हम अपनी ज़िंदगी के भीतर से ही कहने की शैली ईज़ाद करते हैं। वह जितना हमारे भीतर से आएगी, उनती सघनता से वह दूसरों को महसूस भी होगी। इसे हम एक तरह की कसौटी भी मा...
Shachinder Arya
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कभी-कभी ख़ुद को दोहराते रहा चाहिए। अच्छा रहता है। गहराई नापते रहो। इसका अंदाज़ा बहुत ज़रूरी है। पता रहता है, हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ है। बड़े दिनों से सोच रहा था, कहाँ से शुरू करूँ। मन में एक ख़ाका घूमते-घूमते थक गया। बस हरबार यही सोचता रहा, कैसे दिन हुआ करते थे।...
Shachinder Arya
157
इधर सोचने बहुत लगा हूँ। पुराने दिनों पर घंटों सोचते हुए हफ़्तों बिता सकता हूँ। इतने दिन बिता देने की यह काबिलियत मुझमें अचानक घर नहीं कर गयी। यह मेरे ख़ून में है। क्योंकि मेरे ख़ून में इस मिट्टी की हवा नहीं है। पानी भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। जिस-जिस के ख़ून में यहाँ...
Shachinder Arya
157
पता नहीं यह कैसी अलसाई-सी सुबह होती? सब तुम्हारे आने की आहट में न जाने कब से टकटकी लगाए ऊँघते उनींदे करवट लिए वहीं बैठे रहते। तुम आते, तो पता नहीं आज कैसा होता। शायद इस अधूरी दुनिया का अधूरापन कुछ कम हो जाता। हम भी कुछ पूरे होकर थोड़े और भर जाते। तुम थोड़ी देर करते,...