ब्लॉगसेतु

ऋता शेखर 'मधु'
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हे अशोक ! वापस आकरहे अशोक! तुमशोकहरण कहला जाओलूटपाट से सनी नगरियालगती मैली सबकी चदरियानैतिकता का उच्चार करोसद्भावों का संचार करोप्रीत नीर सेहे अशोक! तुमजन जन कोनहला जाओजितने मुँह उतनी ही बातेंसहमा दिन चीखती रातेंमेघ हिचक जाते आने मेंसूखी धरती वीराने मेंहेमपुष्प सेह...
ऋता शेखर 'मधु'
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जिसने मोर मुकुट किया है धारणउनके चरणों की मैं हूँ पुजारनअपने मुख से दधि लपटाएबाल रूप में कान्हा भाएमात जसोदा लेती बलैंयाँनंद मंद मंद मुस्काएजिसने बैजंती किया है धारणउनके चरणों की मैं हूँ पुजारनगौर वर्ण की राधा प्यारीकृष्ण की सूरत श्यामल न्यारीसदा प्रीत की रीत निभाए...
ऋता शेखर 'मधु'
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आज मैं....आज मैंदेवकी का दर्द यशोदा का वात्सल्यराधिके का प्रेम रुक्मिणी का खास हूँआज मैवासुदेव की चिंता नंद का उल्लास गोपियों का माखनचोरपनघट का रास हूँआज मैंकंस का संहारककालिया का कालसुदामा का सखायोगमाया का विश्वास हूँआज मैंद्रौपदी का भ्रातापार्थ का सारथीगीता का प्...
ऋता शेखर 'मधु'
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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूपज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 40खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्यकर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्यदुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कानप्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहानलेकर गठरी आग की, वह चलता दिन रातबदले में नभ दे रहा,...
ऋता शेखर 'मधु'
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साझा अनुशासन- लघुकथाउस शहर में मंदिर और मस्जिद अगल बगल थे| ईद में दोपहर एक बजे नमाजियों की कतार मंदिर के गेट तक आ जाती और रामनवमी में हनुमान जी को ध्वाजारोहण के लिए भक्तों की पंक्ति मस्जिद के सामने तक पहुँच जाती| इस बार प्रशासन को चिन्ता हो रही थी कि भीड़ को क...
ऋता शेखर 'मधु'
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1.2121/ 2121/ 2121/ 212आन बान शान से जवान तुम बढ़े चलोविघ्न से डरो नहीं हिमाद्रि पर चढ़े चलोवीर तुम तिरंग के हजार गीत गा सकोशानदार जीत के प्रसंग यूँ गढ़े चलो 2.2212/ 2212/ 2212/ 2212सरगम हवाओं की मुहब्बत से भरी सुन लो जरामहकी फ़िजा से फूल की तासीर को गुन लो जर...
ऋता शेखर 'मधु'
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हरी दूब की ओस पर, बिछा स्वर्ण कालीनकोमल तलवों ने छुआ, नयन हुए शालीन 30छँट जाती है कालिमा, जम जाता विश्वासजब आती है लालिमा, पूरी करने आसज्यों ज्यों बढ़ता सूर्य का, धरती से अनुरागझरता हरसिंगार है, उड़ते पीत परागपहन लालिमा भोर की, अरुण हुआ है लालचार पहर को नापकर, होता र...
ऋता शेखर 'मधु'
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प्रतिपल स्वर्णिम रश्मियाँ, छेड़ रहीं खग गानआकुल व्याकुल सी धरा, झटपट करे विहान२०ध्यानमग्न प्राची रचे, अरुणाचल में श्लोकमन की खिड़की खोल मनु, फैलेगा आलोक१९सूरज भइया आज तो, कर लो तुम आराममई दिवस है मन रहा, फिर क्यों करना काम१८तीखी तीखी धूप जब,पहुँचाए आघाततब मेघो के न...
ऋता शेखर 'मधु'
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खुशियों की ऊँचाई सेव्यथा की गहराई तकअमराई की खुशबू से यादों की तन्हाई तकजाने कितनी नज्म कहानीसिमट जाती हैं पुस्तक मेंजितने लोग उतने दर्दजितने लम्हे उतने क्षोभकुछ व्यक्त कुछ रहे अव्यक्तअथाह मन की अनगिन सोचबल खाती हैं पुस्तक मेंभोर की रश्मियाँ सुनहरीरुपहली चाँदनी घोर...
ऋता शेखर 'मधु'
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समभाव से बाँट रहा, सूरज सबको धूप|ऊर्जापोषित हम मनुज, खोलें मन का कूप||१०स्वर्ण रथ पर सूर्य पथिक, आया मेरे देश|मंजर उत्साहित हुए, मुदित बने परिवेश||९एक गेंद लुढ़का दिया, रवि ने भोरम भोर|उसके पीछे चल दिए, मनु पंछी अरु ढोर||८सूरज का रस्ता कभी, ना होता है जाम|रुकावटों क...