ब्लॉगसेतु

Roli Dixit
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GOOGLE IMAGEये मेरे आखिरी शब्दजो कल डायरी बन जाएंगे;एक भयंकर अंतर्द्वंद्व,उथल-पुथल का जीता-जागता उदाहरण हैंमैं, मेरे मैं कोमिट्टी में मिलाने जा रही हूँ,माँ, हो सके तो माफ कर देना मुझेइस देह पर बिना हक़ काहक़ जता रहीं हूँ,पापा, तुम्हारा दिया हुआ आत्मसम्मानन बचा पाई,जो...
Roli Dixit
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आज बच्चे को अस्पताल ले जाना था..ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ी..पहुंचने में देर हो गई नम्बर आने में वक़्त था..पतिदेव मुझपर बरस पड़े, 'तुम्हारी वजह से हुआ ये, ऑफिस में लंच के बाद पहुंचने को बोला था अब क्या करूं?''मैडम आप प्लीज किनारे आकर लड़ाई कर लीजिए, मुझे झाड़ू मारना है' मै...
Nitu  Thakur
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इस दुनिया के नक्शे पर एक छोटा सा अस्तित्व हमारा झूठे भ्रम में जिंदा है जो करता रहता मेरा तुम्हारा बिना वजह ही लड़ते रहते भूल के मानव धर्म हमारा ढूंढ रहा है खुद ही खुद को जाने क्यों व्यक्तित्व हमारा सत्य,अहिंसा का पथ छोड़ा ...
Yashoda Agrawal
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अस्तित्व..... और अस्मिता बचाने की लडाईखूब लडो जुझारू हो कर लड़ोपर रुको सोचो ये सिर्फ अस्तित्व की लड़ाई है या चूकते जा रहे संस्कारों की प्रतिछाया... जब दीमक लगी हो नीव मेफिर हवेली कैसे बच पायेगी नीव को खाते खातेदिवारें हिल जायेगीएक...
Yashoda Agrawal
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जग में मेरा अस्तित्वतेरी पहचान है मां भगवान से पहले तू हैभगवान के बाद भी तू ही है मांमेरे सारे अच्छे संस्कारों काउद्गम  है तू मांपर मेरी हर बुराई कीमै खुद दाई हूं मांतूने तो सद्गुणों ही दियेओ मेरी मांइस स्वार्थी संसार नेसब स्वार्थ सीखा दिये मां।ओ मेरी मां...
Kailash Sharma
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ढलका नयनों सेनहीं बढ़ी कोई उंगली थामने पोरों पर,गिरा सूखी रेत में खो दिया अपना अस्तित्व,शायद यही नसीब थामेरे अश्क़ों का।*****आज लगा कितना अपना सा सितारों की भीड़ में तनहा चाँद सदियों से झेलता दर्द प्रति दिन घटते बढ़ने का,जब भी बढ़ता  वैभवदे...
mahendra verma
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भीड़ में अस्तित्व अपना खोजते देखे गए,मौन थे जो आज तक वे चीखते देखे गए।आधुनिकता के नशे में रात दिन जो चूर थे,ऊब कर फिर ज़िंदगी से भागते देखे गए।हाथ में खंजर लिए कुछ लोग आए शहर में,सुना हे मेरा ठिकाना पूछते देखे गए।रूठने का सिलसिला कुछ इस तरह आगे बढ़ा, लोग जो आए मनाने...
केवल राम
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गत अंक से आगे...!!! 4. धर्म के वास्तविक महत्व को समझने की कोशिश करें: आदमी किसी भी समाज में पैदा हो, लेकिन दो चीजें उसके जन्म के साथ ही उससे जुड़ जाती हैं. एक है “जाति” और दूसरा है “धर्म”. संसार में अधिकतर यह नियम सा ही बन गया है कि जो जिस जाति में पैदा होगा उस...
केवल राम
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गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए ह...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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समाचार  पढ़ा- "बेटे   ने   सर्द   रात  में   बाप   को  घर  के   बाहर   सुला  दिया " संवेदनाविहीन  होते   समाज  का यह  सचअब   किसी   आवरण   में  नहीं   ढका &...