ब्लॉगसेतु

Kailash Sharma
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बन न पाया पुल शब्दों का,भ्रमित नौका अहसासों कीमौन के समंदर में,खड़े है आज भी अज़नबी से अपने अपने किनारे पर।****अनछुआ स्पर्शअनुत्तरित प्रश्नअनकहे शब्दअनसुना मौन क्यों घेरे रहतेअहसासों को और माँगते एक जवाब हर पल तन्हाई में।****रात भर सिलते रहे दर्द की चादर,उधेड़ गया फिर...
मधुलिका पटेल
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कभी फादर्स डे कभी मदर्स डेहर साल आते हैं सब कुछ मिलता है बाज़ारों में उपहारों के लिए पर नहीं मिलता तो वो वादों के शब्दजो चाहिए होते हैं हर माता - पिता को क्योंकि वो दुकानों में नहीं दिलों में बिकते हैं और एक आश्वासन और विश्वास कीनज़रों के न...
Kailash Sharma
172
जब भी पीछे मुड़कर देखाकम हो गयी गति कदमों की,जितना गंवाया समयबार बार पीछे देखने मेंमंज़िल हो गयी उतनी ही दूर व्यर्थ की आशा में।****बदल जाते हैं शब्दों के अर्थव्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थअगर समझ पाओ तो।****झुलसते अल्फाज़,कसमसाते अ...
अपर्णा त्रिपाठी
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बडी खामोशी से हमने चुन ली खामोशीबेअदबी ही अदब जबसे जमाने में हुआकिससे करे शिकायत किसकी करे शिकायतदामन में दागों का फैशन जरा जोरों पे हैखुदा का शुक्र जो बक्शा भूल जाने का हुनरकुछ तो बच गया जिगर लहू लुहान होने सेतबाहियों के मंजर पे जाता दिखता है जमानाबर्बादियां जब तर...
 पोस्ट लेवल : अहसास तहजीब
Yashoda Agrawal
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मौन तोड़ क्यूँ बात करें पुनि घात और प्रतिघात करें बेहतर थोड़ा सा चुप रह कर मन से मन की बात करें !चिंतन और मनन की संतति मौन सुपुत्र सा ही साजे रार प्रतिकार उसे नहीं भाता हर मन का संताप हरे !मौन विधा अति सुन्दर सुथरी कभी ना कोई अहित क...
Yashoda Agrawal
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उनकी नजरों मैं हमने देखा बला की चाहत छुपी हुई है छलक के आँसू निकल के बोला यही तो आदत बड़ी बुरी है ! चलते चलते मुंडे अचानक तिरछी नजर से जो हमको देखा भीगे से लब मुस्कुरा के बोले कहके ना जाना आदत बुरी है ! आंखों मैं आँसू हँसी लबो...
Yashoda Agrawal
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है मुफ़लिसी का दौर पर हिम्मत तो देखिए,इस शायर-ए-फनकार की मोहब्बत तो देखिए।बिन पंख के ही उड़ने को बेताब किस कदर,नादान परिंदे की हसरत तो देखिए।सूखे में किसानों का जीना मोहाल था,अब बाढ़ है, खुदाई रहमत तो देखिए।जब से हमारे शहर अदाकार आ गए,बाज़ार में अश्कों की कीमत तो देखिए...
sanjiv verma salil
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कविता: अहसास * 'अहसास' तो अहसास है वह छोटा-बड़ा या पतला-मोटा नहीं होता.'अनुभूति' तो अनुभूति है उसका मजहब या धर्म नहीं होता.'प्रतीति' तो प्रतीति है उसका दल या वाद नहीं होता. चाहो तो 'फीलिंग' कह लो लेकिन कहने से पहले 'फील' करो.किसी के घाव को हील करो. कभी 'स्व' से आरम्...
Yashoda Agrawal
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सरेआम  कैसे  ज़ख्मों  से पर्दा  हटा दूँ!ज़िगर है घायल आहों को कैसे सुना दूँ!! बारीकियां होती हैं ज़ख्मों की ऐ जाने ज़िगर! ‎किस तरह लफ़्ज़ों की माला से ग़जल बना दूँ!!एक हम ही नही है जख्मी बेमुरव्वत जहाँ में!हर शख़्स लहूलुहान है कैसे उसे सुकुते...
Yashoda Agrawal
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छुम छुम छन छन करतीकानों में मधुर रस घोलतीबहुत प्यारी लगी थी मुझकोपहली बार देखी जब मैंनेमाँ की हाथों में लाल चूड़ियाँटुकुर टुकुर ताकती मैंसदा के लिए भा गयी अबोध मन को लाल चूड़ियाँअपनी नन्ही कलाईयों मेंकई बार पहनकर देखा थामाँ की उतारी हुई नयी पुरानीखूब स...