ब्लॉगसेतु

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--महक लुटाते कानन पावन नहीं रहेगोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे--आज आदमी में मानवता सुप्त हुईगौशालाएँ भी नगरों से लुप्त हुई दाग लगे हैं आज चमन के दामन मेंवैद्यराज सा नीम नहीं है आँगन मेंताल और लय मनभावन नहीं रहेगोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे--यौवन आने से पहले सूखी...
अनीता सैनी
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एक नन्हा-सा पौधा तुलसी का, पनपा मेरे मन के एक कोने में, प्रार्थना-सा प्रति दिन लहराता, सुकोमल साँसों का करता दानसतत प्राणवायु बहाता आँगन में    संताप हरण करता हृदय का,   संतोष का सुखद एहसास सजा,  पीड़ा को पल में...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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अंगारे आँगन में सुलग-दहक रहे हैं, पानी लेने परदेश जाने की नौबत क्यों ?न्यायपूर्ण सर्वग्राही राम राज्य में नारी को इंसाफ़ के लिये दर-ब-दर भटकना क्यों?बाढ़ में सब बह गया फ़सलें हुईं तबाह विदेशों में जलसों की बेहूदा ख़बरें क्यो...
Kailash Sharma
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गीला कर गयाआँगन फिर से,सह न पायाबोझ अश्क़ों का,बरस गया।****बहुत भारी हैबोझ अनकहे शब्दों का,ख्वाहिशों की लाश की तरह।****एक लफ्ज़जो खो गया था,मिला आजतेरे जाने के बाद।****रोज जाता हूँ उस मोड़ पर जहां हम बिछुड़े थे कभी अपने अपने मौन के साथ,लेकिन रोज टूट जाता स्वप्नथामने से...
Kailash Sharma
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बरस गया सावन तो क्या है, मन का आँगन प्यासा है।एक बार फिर तुम मिल जाओ, केवल यह अभिलाषा है।अपनी अपनी राह चलें हम,शायद नियति हमारी होगी।मिल कर दूर सदा को होना,विधि की यही लकीरें होंगी।इंतज़ार के हर एक पल ने, बिखरा दिए स्वप्न आँखों के,रिक्त हुए हैं अश्रु नयन के, मन में...
shashi purwar
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नमस्कार मित्रों आपसे साझा करते हुए बेहद प्रसन्नता  हो रही है कि--   शशि पुरवार का दूसरा संग्रह  * " धूप आँगन की " ** भी बाजार में उपलब्ध है। धूप आँगन की " जैसे आँगन में चिंहुकती हुई नन्ही परी की अठखेलियां, कभीठुमकना तो कभी रूठ जाना,कभी नेह की गु...
sanjiv verma salil
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नवगीत-आँगन टेढ़ानाच न आये*अपनी-अपनी चाल चल रहेखुद को खुद हीअरे! छल रहेजो सोये ही नहींजान लोउन नयनों मेंस्वप्न पल रहेसच वह हीजो हमें सुहायेआँगन टेढ़ानाच न आये*हिम-पर्वत हीआज जल रहेअग्नि-पुंजआहत पिघल रहेजो नितांतअपने हैं वे हीछाती-बैठेदाल दल रहेले जाओ वहजो थे लाये...
 पोस्ट लेवल : नवगीत आँगन टेढ़ा
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हैक़ानून क्यों इतना नर्म है ?मॉब-लिंचिंग का यह भयावह दौरइंसानियत के लिये अब कहाँ है ठौरजब किसी मज़लूम को सताया जाता थाआततायी भीड़ के आगे खड़े होते थे हमआज किसके साथ खड़े होते हैं हम ?तमाशा देखते हैं और विडियो बनाते हैं हमक्यों उतारू हो गयी है भीड़सड़...
Ravindra Pandey
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कट जाती उम्र हँस कर, कुछ ऐसा बसर होता,ये ज़िन्दगानी सचमुच, पंछी-सा सफर होता।ना फ़िक्र में हम घुलते,  न जाया होती  उमर,मस्ती में मुस्कुराते,  सब  दर्द  सिफ़र होता।कोई नहीं पराया,   सब  दिल के पास  होते,परवाह सबकी होती, जन्नत...
Sandhya Sharma
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गौरैया बिटिया एक समानदोनों घर- आँगन की शानआँगन में कुछ दाने रखनाएक दिए में पानी रखनातिनकों की निगरानी रखनाअपनी कोई निशानी रखनायाद मेरी कहानी रखना.....(आऊँगी चिड़िया बनकर)