ब्लॉगसेतु

Bharat Tiwari
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प्रतियोगिता का दबाव और कहानीतो परियां कहां रहेंगी— आकांक्षा पारे काशिव (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); 100% पढ़ी जाने वाली और 101% तसल्ली बख्श कथा है आकांक्षा पारे काशिव की 'तो परियां कहां रहेंगी'। ज़िन्दगी की वह जंग जो एक सन्तान प्रतियोग...
Bharat Tiwari
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दूर से नीले रंग की बस ऐसे चली आ रही थी जैसे अगर एक्सीलेटर से पैर हटा तो चालान कट जाएगा। सड़क पर खड़े लोग तितर-बितर हो गए। बस ने चीखते हुए ब्रेक लगाया और बस की हालत देख कर इंतजार में खड़े लोग सकते में आ गए। अंदर सवारियों और बकरियों में अंतर करना मुश्किल था। बाहर लोग...
Bharat Tiwari
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इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी  में प्रकाशित आंकाक्षा पारे की कहानी नीम हकीमरक्कू भैया का कहा ब्रहृम वाक्य। ऐसे कैसे टाल दें। तीन दिन खद्दर कपड़े से नाक पोंछ-पोंछ कर भले ही बंदर के पिछवाड़े की तरह हो जाए लेकिन मजाल क्या कि तीन दिन से पहले कोई सीतोपलादि का क...
prabhat ranjan
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समकालीन लेखिकाओं की सीरिज में आज आकांक्षा पारे की कहानी. उनकी कहानियां स्त्री लेखन के क्लीशे से पूरी तरह से मुक्त है. उनकी कहानियों में एक अन्तर्निहित व्यंग्यात्मकता है जो उनको अपनी पीढ़ी में सबसे अलग बनाती है. आप भी पढ़िए उनकी एक प्रतिनिधि कहानी- मॉडरेटर ======...
 पोस्ट लेवल : akanksha pare आकांक्षा पारे
अनंत विजय
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पिछले साल मई में आकांक्षा पारे काशिव ने अपना कहानी संग्रह ‘तीन सहेलियां तीन प्रेमी’ दिया था । पढ तो उसी वक्त लिया था, लिखने का मन भी बनाया था, परंतु आलस्य की वजह से लिखना संभव नहीं हो पाया । आकांक्षा पारे की कहानियां पहले भी पत्र पत्रिाओं में छपकर खासी चर्चा बटोर च...
अंजू शर्मा
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अपने वायदे के अनुसार कुछ कहानियां अपने ब्लॉग में  लगा रही हूँ!  सबसे पहले पढ़िये कथाकार मित्र आकांक्षा पारे की कहानी "यादों से भरा मन"!  महानगरीय संवेदनाओं पर ठंडेपन के इल्ज़ाम कई बार सच को छुए  बिना ही एकतरफा फैसलों की ओर बढ़ जाते हैं, पीछे रह जात...
 पोस्ट लेवल : कहानी आकांक्षा पारे