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विजय राजबली माथुर
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 पोस्ट लेवल : हरा धनिया घी पानी आटा
विजय राजबली माथुर
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रवीन्द्र  सिंह  यादव
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कार्तिक-कृष्णपक्ष  चौथ का चाँद देखती हैं सुहागिनें आटा  छलनी  से....  उर्ध्व-क्षैतिज तारों के जाल से दिखता चाँद सुनाता है दो दिलों का अंतर्नाद। सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प होता नहीं जिसका विकल्प एक ही अ...
Kajal Kumar
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उसे अपनी ज़िंदगी से यूं तो कोई शि‍कायत नहीं थी पर फि‍र भी बहुत से ऐसे सवाल थे जि‍नके जवाब उसके पास नहीं थे; कि‍ताबें थीं कि‍ उनमें अलग-अलग तरह की बातें लि‍खी मि‍लतीं. और उन कि‍ताबों से भी उठते दूसरे सवालों के जवाब देने वाला फि‍र कोई न होता. इसी ऊहापोह में उसने एक ब...
Kajal Kumar
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सड़क कि‍नारे उसके पास थोड़ी सी ज़मीन थी. उसी पर कुछ अपनी खेती, कुछ खेती बटाई पर लेकर परि‍वार का पेट पाल रहा था. फसल के दि‍नों पूरा परि‍वार जुटकर मेहनत करता. फि‍र फसल का इंतज़ार और अपनी गाय की सेवा. एक दि‍न गांव में एक लाला जी आए और समझा-बुझाकर उससे ज़मीन खरीद ली....