ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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वह एक खाली-सी ढलती दोपहर थी। दिमाग बेचैन होने से बिलकुल बचा हुआ।किताबें लगीं जैसे बिखरी हुई हों जैसे. कोई उन्हें छूने वाला नहीं था. कभी ऐसा भी होता, हम अकेले रह जाते हैं।किताबों के साथ कैसा अकेलापन. उनकी सीलन भरी गंध मेरी नाकों के दोनों छेदों से गुज़रती हुई पता नहीं...
Shachinder Arya
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कभी होता, उसके खर्राटों से वह ख़ुद जग जाता। जग जाता के साथ लेटे सब न जग जाएँ। सबके सोते रहने पर वह उठता। उठकर बैठ जाता। बैठना, थोड़ी रौशनी के साथ होता। रात उस खयाल में ख़ुद को अकेले कर लेने के बाद खुदसे कहीं चले जाने लायक न बचता, तो ख़ूब रोता। आँसू नहीं आते। याद आती। य...
Shachinder Arya
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रात साढ़े दस बजे के बाद। छत पर टहलते हुए। एक हाथ से कान पर फ़ोन। दूसरे से नाक पोंछते हुए। दिल्ली की ठंड ऐसे ही हरबार इन दिनों में घेर लेती। इस बार भी कश्मीर में बर्फ़ गिरने के बाद से बढ़ गयी। वापस कमरे में लौट कर सोच रहा हूँ एक ख़त लिखने बैठ जाऊँ। तुम्हारी बहुत याद आ र...
Shachinder Arya
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पता नहीं, जब मैंने इस तस्वीर को देखा, तबसे किन भावों से भर गया हूँ। इसे पल-पल अपने अंदर उतरते देना है। इसके बाद भी नहीं समझ नहीं पा रहा, यह क्या है? सोचता हूँ, तस्वीरें कितनी यात्राएं करती हैं। यह कहाँ से चली होगी। किस कैमरे से किसने कहाँ खींची होगी। कितने सालों ब...
Shachinder Arya
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उस वक़्त उसकी काँख में कोई बाल नहीं था, जब पहली बार उसने उसे वहाँ चूमने के साथ अपनी दूसरी प्रेमिका की याद को विस्मृत करते हुए वह तस्वीर खींची थी। दोनों अभी एक-दूसरे के लिए नए-नए साथी बने हैं। वह अकसर अपनी सहेलियों से सुनती रहती। लड़कियों का ‘सेफ़ डिपॉज़िट’। वह उसकी एफ़ड...
Shachinder Arya
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इन दीवारों के बीच रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया कि घर में होता तो कभी बाहर निकलने के एहसास से नहीं भर पाता। वह चुप रहकर इन दीवारों को सुनने की कोशिश करता। तब उसे एक धुन सुनाई देती। धीमे-धीमे। आहिस्ता-आहिस्ता। जिधर से वह आवाज़ आती, वह उस तरफ़ अपनी थाली घुमा लेता। प्या...
Shachinder Arya
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वह एकदम शांत क़िस्म की दीवारों वाला घर था। छिपकली भी आहिस्ते से उनसे चिपकी रहती और कोई जान भी न पाता। जाले दरवाज़े के पीछे छिपकर सालों से वहीं बने हुए थे। पलस्तर धीरे-धीरे अम्मा की अधीर आँखों की तरह उखड़ रहा था। सफ़ेदी को सीलन के साथ पपड़ी बने ज़माना बीत गया, किसी को को...
Shachinder Arya
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जब हम सब खाना खा लेते हैं, तब सोचने लगता हूँ कि वह जल्दी से बर्तन माँज लें और हम दोनों हर रात कहीं दूर निकल आयें। हम दोनों की बातें पूरे दिन इकट्ठा होती गईं बातों के बीच घिरकर, झगड़ों के बगल से गुज़रकर सपनों के उन चाँद सितारों में कहीं गुम हो जातीं। हर रात ऐसा ही होन...
Shachinder Arya
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हम कभी नहीं सोचते, पर हो जाते हैं। कितने दोस्त बन जाते, इसी सब में। पर फ़िर भी हम तो दोस्त उसी के बनना चाहते। मन मार लेते। सब साथ दिखते। पर हम उसके साथ होना चाहते। कुछ न बोलते हुए भी सब बोल जाते। पर वह कहीं न होती। हम कहीं न होते। जगहें वहीं रह जातीं। हम हम नहीं रह...
Shachinder Arya
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हज़रत निज़ामुद्दीन घंटा भर पहले पहुँचकर वह क्या-क्या कर सकता है, इसकी लिस्ट वह कई बार बनाकर मिटा चुका था। हर डूबती शाम, उसका दिल भी डूब जाता। जिस कमरे पर वह साल दो हज़ार दो से रह रहा था, उसे अपने ही गाँव के एक लड़के को दिलाकर एक ठिकाना बचाए रखने की ज़िद काम नहीं आई। हर...