ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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कोई भी उस कमरे में कभी भी दाख़िल होता, तो उसे लगता, यह कमरा एक जमाने में किसी दफ़्तर का हिस्सा रहा होगा। टूटी मेज़। धूल खाती फ़ाइलें। कोनों में पड़ी कुर्सियाँ। कटे-फटे जूते। मकड़ी के जाले। खिड़की से आती हवा। इधर-उधर बिखरे पड़े पन्ने। चूहों की लेड़ीयाँ। बजबजाता फ़र्श। फटा हुआ...
Shachinder Arya
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पता नहीं यह कैसी अलसाई-सी सुबह होती? सब तुम्हारे आने की आहट में न जाने कब से टकटकी लगाए ऊँघते उनींदे करवट लिए वहीं बैठे रहते। तुम आते, तो पता नहीं आज कैसा होता। शायद इस अधूरी दुनिया का अधूरापन कुछ कम हो जाता। हम भी कुछ पूरे होकर थोड़े और भर जाते। तुम थोड़ी देर करते,...
Shachinder Arya
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वह रोज़ रात आधा पहर बीत जाने के आस-पास पसीने से तरबतर कपड़ों में ख़ुद को ढोते हुए लौट आते। लौटना कमीज़ को वापस घर लाने की तरह होता। वह कोई चित्रकार नहीं थे। पर उनके इस कैनवस पर रोज़ अलग-अलग तरह की चित्रकारी होती। कभी बनियान में अरझी सूखी घास का तिनका किसी किले की सबसे ऊ...
Shachinder Arya
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उसने कभी सोचा नहीं था के आज इस बरसात के बाद इस ढलती शाम में अचानक वह फ़िर दिख जाएगी। वह अभी भी साँवली थी। उसे यह रंग सबसे जादा पसंद था। अपना नहीं, उस लड़की का। जैसे अभी भूरे बादलों ने उजले आसमान को ढक लिया हो। वह अपने दिल की धड़कनों में ढलते हुए सूरज की तरह धीरे-धीरे...
Shachinder Arya
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{यह भी बारिश में होने की एक स्टीरियोटाइप कहानी है। छोटी-सी कहानी। बारिश के पानी में भीगते हुए भागने की कहानी। उनके पास छाता नहीं है, जिसे हम छतरी कहते हैं। इसलिए दोनों भीग जाएँगे।} बूँदें थीं, कि रुक नहीं रही थी। उन्हे तीन दिन हो गए, लगातार। अपने वजन को सहन न...
Shachinder Arya
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कितनी शामों से यह शाम ऐसे ही ठहरी हुई है। एकदम बिलकुल शांत। रुकी हुई। खिड़की से फ़र्लांग भर की दूरी पर उस अमलतास के फूलों के झर जाने के बाद से सहमी हुई पत्तियों की तरह। हम भी कहीं मिट्टी में रोपे हुए पेड़ होते तो आज तीस साल बाद कितने बड़े होकर किसी आँधी पानी में टूटकर...
Shachinder Arya
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वह खाली कमरे का एहसास अपने अंदर भरकर पीछे कई मिनट से अपनी डायरी में छिपाये उस ख़त के बार में सोचता रहा। वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसा सोच कर फ़िर कुर्सी में धँस गया। छतपंखे की फाँकें उसके अंदर निकाल आयीं। वह रोने को हुआ, पर रो न सका। इधर कुछ नींद में जाने से पहले के ख़यालो...
Shachinder Arya
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वह खाली कमरे का एहसास अपने अंदर भरकर पीछे कई मिनट से अपनी डायरी में छिपाये उस ख़त के बार में सोचता रहा। वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसा सोच कर फ़िर कुर्सी में धँस गया। छतपंखे की फाँकें उसके अंदर निकाल आयीं। वह रोने को हुआ, पर रो न सका। इधर कुछ नींद में जाने से पहले के ख़यालो...
Shachinder Arya
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धूप-छाव सामने खिड़की से लगे शीशे के पार लगातार आँख-मिचौली खेलते दिखते रहे। उनका दिखना आँखों से नहीं रौशनी से है, जो बादलों को चीरकर अंदर तक दाखिल होती जाती। दुनिया उन लकड़ी के कब्जों  से बहुत दूर भी रही होगी, जो इस वक़्त दीवार से कहीं भागे जाने को नहीं दिख रहे। व...
Shachinder Arya
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उधर कोने वाली बरसाती में वह अचानक आकर छिप जाता। वहाँ अँधेरा इस कदर काला रहता के उसमें सिवाए साँसों के किसी भी चीज़ का कोई एहसास नहीं रह जाता। रह जाना कुछ छूट जाना था, उसकी यादें छूट रही थीं। ख़ुद वह कहीं पीछे किसी लाल छतरी वाली सपनीली दोस्त की परछाईं में गुमसुम-सा रह...