ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
155
दोनों अगल-बगल बैठे अपनी दुनिया में पहुँच गए। ऐसी दुनिया, जहाँ सब वहीं होते हुए कहीं छुप गए। हम भी छुपने की तरह दिखते रहे। दोनों का प्यार भी छुपने की तरह दिखता रहा। चाहते हुए भी कह न पाने की कसक के बाद अकेले होने की टीस के बाद उपजी गाँठ की तरह। उस सेमर के पेड़ पर लगे...
Shachinder Arya
155
एक छोटीसी झोपड़ी थी। उन सबने मिलकर उसका नाम झोपड़ी ही रखा था। शहर और सड़क कही जाने वाली संरचनाओं से बहुत दूर। हमारी परछाईं से भी बहुत दूर। कहीं दिखाई न देने वाली जगह के पास। वहाँ तक जाने वाले रास्ते को वह कितना भी याद करतीं, वह कभी याद नहीं रहता। यह भूल जाने के बाद या...
Shachinder Arya
155
उसने अपने एक कमरे वाले शहर के बाहर कई कमरों वाले शहर की संभावनाओं से कभी इंकार नहीं किया। पर उसे पता था कोई जितना भी कहे बाहर का शहर उसके अंदर कभी दाखिल नहीं हो सका। उसने अपने शहर को नाम दिया, घर। घर ही उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी। वह बाहर कहीं भी रहता, वापस इस दुनिय...
Shachinder Arya
155
ऐसी रात फ़िर कभी न आए। पूरी रात मम्मी के बाएँ पैर में दर्द इतना असहनीय बना रहा कि एक पल के लिए भी कहीं सुकून नहीं मिला। पैर फैला लेना तो दूर की बात है। रह रहकर उस अँधेरे कमरे में रोने को हो आता। कि मम्मी का पैर सवा नौ बजे के बाद ऐसा होता रहा। ग्यारह बजे बिजली की तरह...
Shachinder Arya
155
दिल्ली। एक जनवरी, दो हज़ार पंद्रह। रज़ाई में बैठे। पैर में मोज़े पहने। वक़्त सुबह के दस बजकर बीस मिनट। कभी-कभी हम बहुत सारी बातें खुद से करते रहते हैं जिनका हमसे बाहर कोई मतलब नहीं होता। हम ऐसे ही कहीं किसी खाली कमरे में बैठे होते हैं। आहिस्ते से अपनी डायरी में बेतरतीब...
Shachinder Arya
155
वह इतनी छोटी जगह थी, जिसे कमरा कहना, किसी कमरे की चार दिवारी को तोड़कर फ़िर से कमरा बनाने की तरह होता। ऊपर पक्की छत नहीं थी। ऐबस्टस की टीन थी। बरसात में वह बूंदों के साथ कई धुनें एकसाथ गुनगुना रही होतीं। गर्मियों में इतनी गर्म कि उसके नीचे बैठे रहना मुफ़्त में स्टीमबा...
Shachinder Arya
155
आज दरी पर नई चादर बिछी हुई है। सुबह से ही घर से गेंदे के फूलों की ख़ुशबू आ रही थी। यह किसी बाहर से आने वाले मेहमान के लिए नहीं है। आज शादी के बाद गाँव से पहली बार बड़े लड़के की बहू आ रही है। लड़का अभी पिछले हफ़्ते लौटा है। नौकरी अभी नहीं है। सालभर में हो जाएगी। ऐसा घर म...
Shachinder Arya
155
कमरे में सिर्फ़ कमरा था। वह न खाली था। न भरा था। वह कुछ-कुछ खाली था, कुछ-कुछ भरा था। इस कुछ खाली, कुछ भरे कमरे में वह बालदार लड़का, कुछ कम ख़ूबसूरत लड़की के पास बैठा रहा। वह कुछ कमसूरत लड़की बालदार लड़के के पास बैठी रही। लड़के ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतनी भी ख़ूबसू...