ब्लॉगसेतु

sanjiv verma salil
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तीन मुक्तक- *मौजे रवां१ रंगीं सितारे, वादियाँ पुरनूर२ हैंआफ़ताबों३ सी चमकती, हक़ाइक४ क्यों दूर हैंमाहपारे५ ज़िंदगी की बज्म६ में आशुफ्ता७ क्यों?फिक्रे-फ़र्दा८ सागरो-मीना९ फ़िशानी१० सूर हैं१. लहरें, २. प्रकाशित, ३. सू...
जन्मेजय तिवारी
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                  वह जैसे ही ढाबों के सामने पहुँचा, ढाबे वाले उस पर टूट पड़े । उसे लगा कि उसकी खुशी के भी फूट पड़ने का यही वक्त है । क्यों न लपककर दोनों हाथों से इस वक्त को ही लूट लूँ । वह लूटने के लिए थोड़ा और...